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मेरे दिलक़ो अक्सर छू लेते हैं,
ख़ामोश चेहरे…
हंसते हुए चेहरोंमें,
मुझे फ़रेब नज़र आता हैं l
मैं क़ोई ख़ामोशसी ग़ज़ल ज़ैसा हूँ,
या हूँ क़ोई नज़्म ज़ैसा धीमेंसे गुनगुनाता हुआ…
तभी तो वो भी मुझे पढ़ते हैं,
आहिस्ते आहिस्तेसे ll
जु़बां ख़ामोश मग़र,
नज़रोंमें उज़ाला देख़ा l
उसक़ा इज़हार-ए-मोहब्बतभी,
निराला देख़ा ll