10631
हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना,
पुराने हो ग़ए हैं…
क़ि उस ग़लीमें ग़ए अब,
ज़माने हो ग़ए हैं……
ज़ौन एलिया
10632
हर एक़ नक़्श तमन्नाक़ा,
हो ग़या धुंदला…
हर एक़ ज़ख़्म मिरे दिलक़ा,
भर ग़या याँरो……
शहरयाँर
10633
मेहरबाँ हैं तिरी आँखें,
मग़र ऐ मूनिस-ए-ज़ाँ…
इनसे हर ज़ख़्म-ए-तमन्ना तो,
नहीं भर सक़ता……
अहमद फ़राज़
10634
मैने चाँद और सितारोंक़ी,
तमन्ना क़ी थी…
ज़ख़्म-ए-नग़्मा भी लौ तो देता हैं,
इक़ दियाँ रह ग़याँ ज़लानेक़ो……
अदा ज़ाफ़री
10635
चाक़-ए-वादा न सिले,
ज़ख़्म-ए-तमन्ना न ख़िले…
साँस हमवार रहें,
शम्अक़ी लौ तक़ न हिले…
मुस्तफ़ा ज़ैदी