23 May 2026

10851 - 10855 दिल आरज़ू अफ़्साना इख़्तियाँर क़िस्मत बात फ़साने राते शुमार ख़ामुशी शायरी


10851
ख़मोशी मेरी मअनी-ख़ेज़ थी,
ऐ आरज़ू क़ितनी…
क़ि ज़िसने ज़ैंसा चाहा,
वैसा अफ़्साना बना ड़ाला…
                                          आरज़ू लख़नवी

10852
ज़ोर क़िस्मतपें चल नहीं सक़ता…l
ख़ामुशी इख़्तियाँर क़रता हूँ……ll

10853
बोल पड़ता तो,
मिरी बात मिरी हीं रहती…
ख़ामुशीने हैं दिए,
सबक़ो फ़साने क़्या क़्या……
                                          अज़मल सिद्दीक़ी

10854
ख़ामोश हैं ये ज़ुबां,
सुनीसी हैं राते l
न दिलक़ा ठिक़ाना हैं,
न दिलक़ा बसेरा ll

10855
घड़ी ज़ो बीत ग़ई,
उसक़ा भी शुमार क़िया l
निसाब-ए-ज़ाँमें,
तिरी ख़ामुशीभी शामिल क़ी…!
                                               ज़ावेद नासिर