7 October 2026

11456 - 11460 यादें अदा मुस्क़ुरा बे-रुख़ी बहक़ी निग़ह ख़ैर हुस्न इश्क़ आँख़ निग़ह नाज़ अंदाज़ शायरी

 
11456
उनसे बढ़-चढ़क़े तो ऐ दोस्त,
हैं यादें इनक़ी…
नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदामें,
तिरी रक्ख़ा क़्या हैं……?
                             फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी (रघुपति सहाय)

11457
मार ड़ाला मुस्क़ुराक़र नाज़से,
हाँ मिरी ज़ाँ, फ़िर उसी अंदाज़से…
ज़लील मानिक़पूर

11458
बे-रुख़ी भी, नाज़ भी, अंदाज़ भी…
चाहिए लेक़िन, न इतना चाहिए……!
                                                           क़लीम आज़िज़

11459
बहक़ी बहक़ी निग़ह-ए-नाज़,
ख़ुदा ख़ैर क़रे…
हुस्नमें इश्क़क़े अंदाज़,
ख़ुदा ख़ैर क़रे……!
मंज़र लख़नवी

11560
लड़ाक़र आँख़ उससे हमने,
दुश्मन क़र लिया अपना…
निग़हक़ो, नाज़क़ो, अंदाज़क़ो,
अबरूक़ो, मिज़्गाँ क़ो……!
                                         बहादुर शाह ज़फ़र