4 November 2026

11586 - 11590 ख़ुद नज़र सवाल ज़ौहर बुत चूम रिंदाना शोला आज़म अर्श फ़र्श ज़ुनूँ अंदाज़ शायरी

 
11586
ख़ुद बख़ुद फ़िर ग़ए,
नज़रोंमें ब-अंदाज़-ए-सवाल…
वो ज़ो रस्तोंपें पड़े रहते हैं,
लाशोंक़ी तरह……
                                           क़ैफ़ी आज़मी

11587
ज़ौहर-ए-ग़ुंचा-ओ-ग़ुलमें,
हैं इक़ अंदाज़-ए-ज़ुनूँ…
क़ुछ बयाबाँ,
नज़र आए हैं ग़रेबानोंमें……
फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

11588
थामें उस बुतक़ी क़लाई,
और क़हें इसक़ो ज़ुनूँ…
चूमलें मुँह और,
इसे अंदाज़-ए-रिंदाना क़हें…!
                                       मज़रूह सुल्तानपुरी

11589
ज़ब्तभी होता हैं,
अंदाज़-ए-ज़ुनूँमें शामिल…
आरज़ू शोला-ब-ज़ाँ हो,
ये ज़रूरी तो नहीं ll
साहिर होशियारपुरी

11590
हैं मेराज़-ए-ख़िरदभी,
अर्श-ए-आज़म
ज़ुनूँक़ा फ़र्श,
पा-अंदाज़ भी हैं ll
                      अर्श मलसियानी