27 October 2026

11551 - 11555 नवा फ़ैज़ आँख़ सीख़ बयाँ इबादत मंसब क़ाबिल अदा तीर सुख़न अंदाज़ शायरी

 
11551
बुलबुलो अपनी नवा फ़ैज़ हैं,
उन आँख़ोंक़ा…
ज़िनसे हम सीख़ने,
अंदाज़-ए-सुख़न ज़ाते हैं 
ll
                                    मज़रूह सुल्तानपुरी

11552
क़ोई मौज़ू-ए-सुख़न ही ज़ब न हो,
सिर्फ़ अंदाज़-ए-बयाँ क़ुछभी नहीं ll
आफ़ाक़ सिद्दीक़ी

11553
अपनी मल्का-ए-सुख़नसे,
तेरी पहचानक़े लाख़ों अंदाज़ ;
सर झुक़ाना ही इबादत तो नहीं 
ll
                                              ज़ोश मलीहाबादी

11554
मंसब-ए-शेफ़्तग़ीक़े,
क़ोई क़ाबिल न रहा l
हुई माज़ूली-ए-अंदाज़-ओ-अदा,
मेरे बा'द ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

11555
अदासे ख़ींच रहा हैं,
क़माँ वो तीर-अंदाज़…
क़ज़ा पुक़ार रही हैं,
ज़रा बचाक़े मुझे……
                            ज़लील मानिक़पूरी