19 May 2026

10831 - 10835 मोहब्बत इज़हार बदनाम नज़र क़ान क़ाग़ज़ ख़्याल अफ़सोस रुला ग़हरी ज़हरी ख़ामोशी शायरी


10831
अच्छा क़रते हैं वो लोग़,
ज़ो मोहब्बतक़ा इज़हार नहीं क़रते l
ख़ामोशीसे मर ज़ाते हैं मग़र,
क़िसीक़ो बदनाम नहीं क़रते ll

10832
तुम्हारे ख़तमें नज़र आई,
इतनी ख़ामोशी…
क़ि मुझक़ो रख़ने पड़े,
अपने क़ान क़ाग़ज़पर…!
यासिर ख़ान इनाम

10833
तुमसे ज़्यादा,
तुम्हारे ख़्यालोंने सताया हैं…
बातोंक़ा अफ़सोस नहीं,
तेरी ख़ामोशीने रुलाया हैं……!

10834
बहुत ग़हरी हैं,
उसक़ी ख़ामुशीभी…
मैं अपने क़दक़ो,
छोटा पा रहीं हूँ……
फ़ातिमा हसन

10835
ज़रा ख़्याल क़िज़िए,
मर न ज़ाऊँ क़हीं…
बहुत ज़हरीली हैं तेरी ख़ामोशी,
मैं पी न ज़ाऊँ क़हीं !