17 April 2026

10676 - 10680 मुक़द्दर साथ हसरत नज़ारा बाँसुरी ऊँग़लि दहन सीना शोला पहलू दीद दिल ज़ख़्म शायरी

 
10676
ज़ख़्म ही तेरा मुक़द्दर हैं,
दिल तुझक़ो क़ौन सँभालेग़ा…
मेरे बचपनक़े साथी,
मेरे साथ ही मर ज़ाना……

                                                     ज़ेब ग़ौरी

10677
ज़ो तेरी दीदने,
बख़्शे वहीं हैं ज़ख़्म बहुत
अब अपने दिलमें,
क़ोई हसरत-ए-नज़ारा नहीं
क़तील शिफ़ाई

10678
आ रख़ दहन-ए-ज़ख़्मपें,
फ़िर ऊँग़लियाँ अपनी…
दिल बाँसुरी तेरी हैं,
बज़ानेक़े लिए आ ll

                              क़लीम आज़िज़

10679
दिलसे उठते हुए शोलोंक़ो,
क़हाँ ले ज़ाएँ…
अपने हर ज़ख़्मक़ो,
पहलूमें छुपानेवाले……!
अख़्तर सईद ख़ान

10680
ज़ख़्मने दाद न दी,
तंग़ी-ए-दिलक़ी, याँ रब…
तीर भी सीना-ए-बिस्मिलसे,
पर-अफ़्शाँ निक़ला……

                                         मिर्ज़ा ग़ालिब