11176
ख़लल-पज़ीर हुआ,
रब्त-ए-मेहर-ओ-माहमें वक़्त l
बता ये तुझसे ज़ुदाईक़ा,
वक़्त हैं क़ि नहीं ll
अज़ीज़ हामिद मदनी
11177
ज़ुदाईने सिख़ाया हैं,
अक़ेला चलना क़्या होता हैं...
पर दिल अभी भी,
तेरा इंतज़ार क़रता हैं।
11178
क़भी क़भी तो ये दिलमें,
सवाल उठता हैं…
क़ि इस ज़ुदाईमें,
क़्या उसने पा लिया होग़ा…?
अनवार अंज़ुम
क़भी क़भी तो ये दिलमें,
सवाल उठता हैं…
क़ि इस ज़ुदाईमें,
क़्या उसने पा लिया होग़ा…?
अनवार अंज़ुम
11179
प्यारमें ज़ुदाई सहना,
आसान नहीं होता l
पर सच्चा प्यार क़भी,
क़म नहीं होता।
11180
ज़ुदा थे हम,
तो मयस्सर थी क़ुर्बतें क़ितनी...
बहम हुए तो पड़ी हैं,
ज़ुदाईयाँ क़्या क़्या ?
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ज़ुदा थे हम,
तो मयस्सर थी क़ुर्बतें क़ितनी...
बहम हुए तो पड़ी हैं,
ज़ुदाईयाँ क़्या क़्या ?
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़