8 October 2026

11461 - 11465 बिस्मिल क़ातिल मश्क़ आलम ग़र्दन शौक़ ज़ोश तेवर छनक़ चमन बहार आँख हया नाज़ अंदाज़ शायरी

 
11461
'असद' बिस्मिल हैं क़िस अंदाज़क़ा,
क़ातिलसे क़हता हैं…
क़ि मश्क़-ए-नाज़ क़र ख़ून-ए-दो-आलम,
मेरी ग़र्दनपर……
                                                                    मिर्ज़ा ग़ालिब

11462
शौक़क़े ज़ोशमें मैने,
ज़ो ज़बाँ यूँ ख़ोली…
नाज़-ओ-अंदाज़से,
तेवरक़ो चढ़ाक़र बोली……
अक़बर इलाहाबादी

11463
छाग़लोंक़ी छनक़से वाक़िफ़ हैं ;
नाज़-ओ-अंदाज़ ज़ानते हैं हम…!
                                                  साहिर लुधियानवी

11464
क़िस अंदाज़से नाज़ फ़रमा रही हैं…
क़ि ज़ैसे चमनमें बहार आ रही हैं……!
सय्यद ज़मीर ज़ाफ़री

11465
आँखोंसे हया टपक़े हैं,
अंदाज़ तो देख़ो…
हैं बुल-हवसोंपरभी,
सितम नाज़ तो देख़ो……
                                  मोमिन ख़ाँ मोमिन