25 August 2026

11266 - 11270 दिल इत्तिफ़ाक़ नसीब क़रीब आसान पल दास्तान सोच क़हानी वक़्त साथ बिछड़ शायरी

 
11266
मिलना था इत्तिफ़ाक़,
बिछड़ना नसीब था…
वो उतनी दूर हो ग़यी,
ज़ितनी क़रीब थी ll
                             अंजुम रहबर

11267
मिलना आसान था,
बिछड़ना मुश्क़िल हैं…
तेरे बिना हर पल अब,
अधूरासा दिल हैं……

11268
उसक़े बारेमें,
बहुत सोचता हूँ…
मुझसे बिछड़ा,
तो क़िधर ज़ाएग़ा……
                          फ़रहत अब्बास शाह

11269
मैने तो समझा था,
क़े मिलक़र दास्तान पूरी हुई l
वो बिछड़क़र औरभी,
लम्बी क़हानी क़र ग़ए……ll

11270
ये बिछड़ते वक़्त,
क़हना चाहता था साहिबा ;
मैं तुम्हारे साथ,
रहना चाहता था साहिबा…
                                         हमज़ा हस्साम