10721
अपने दीवानक़ों,
ग़लियोंमें लिए फ़िरता हूँ;
हैं क़ोंई ज़ो,
हुनर-ए-ज़ख़्म-नुमाई ले ले…
अहमद फ़राज़
10722
ज़ब लग़ें ज़ख़्म तो,
क़ातिलक़ों दुआ दी ज़ाए…
हैं यहीं रस्म तो,
ये रस्म उठा दी ज़ाए ll
ज़ाँ निसार अख़्तर
10723
लोग़ क़ाँटोंसे बचक़े चलते हैं,
हमने फ़ूलोंसे ज़ख़्म ख़ाए हैं l
तुम तो ग़ैरोंक़ी बात क़रते हो,
हमने अपने भी आज़माए हैं ll
अहमद फ़राज़
10724
चलो क़ि आज़,
सभी पाएमाल रूहोंसे…
क़हें क़ि अपने,
हर इक़ ज़ख़्मक़ों ज़बाँ क़र लें ll
साहिर लुधियाँनवी
10725
अब क़ौन ज़ख़्म ओ ज़हरसे,
रक़्ख़ेग़ा सिलसिला…l
ज़ीनेक़ी अब हवस हैं,
हमें हम तो मर ग़ए……ll