27 August 2026

11276 - 11380 क़ातिब तक़दीर झग़ड़ साथ सवार रिश्ता तारा आसमान अज़ब हाल पराया शहर बिछड़ शायरी

 
11276
ज़िसक़ो मैं अपना बनाता हूँ,
बिछड़ ज़ाता हैं…
l
मेरी बनती ही नहीं,
क़ातिब-ए-तक़दीरक़े साथ…
ll
                                            शौक़त फ़हमी

11277
तुम्हारा तुम क़हक़र,
रोज़ झग़ड़ना मुझसे…
तुम्हारा आप क़हक़र,
बिछड़नेसे अच्छा था…!

11278
बिछड़क़े भी वो,
मिरे साथ ही रहा हरदम…
सफ़रक़े बादभी,
मैं सफ़रमें सवार रहा 
ll
                                   शक़ील आज़मी

11279
बहुत अच्छा चल रहा था,
यह रिश्ता हमारा…
बिछड़े इस रफ़्तारसे मानो,
मैं आसमान और
वो टूटता तारा हो ग़या…

11280
बिछड़क़े तुझसे,
अज़ब हाल हो ग़या मेरा l
तमाम शहर,
पराया दिख़ाई देता हैं ll

                                    मरग़ूब अली