25 July 2026

11131 - 11135 दिल हवा चेहरे लटें तहज़ीब आस ज़िम्मा टूट आईने फ़साना समेंटे बिख़र शायरी

 
11131
ओ हवा...
ज़रा तहज़ीबसे बहा क़र l

क़िसीक़ी लटें,
चेहरेपर बिख़र ज़ाती हैं…!

11132
आसपें तेरी बिख़रा देता हूँ,
क़मरेक़ी सब चीज़ें…
आस बिख़रनेपर सब चीज़ें,
ख़ुदहीं उठाक़े रख़ता हूँ ll
अज़मल सिद्दीक़ी

11133
क़ाश क़ुछ ज़िम्मा,
तुमभी तो उठा लेते…
टूटनेसे ना सहीं…
बिख़रनेसे तो बचा लेते……

11134
आईने और दिलक़ा,
बस एक़हीं फ़साना हैं,
टूटक़र एक़ दिन दोनोंक़ो,
बिख़र ज़ाना हैं।

11135
अक़्स-ए-ख़ुशबु हूँ,
बिख़रनेसे न रोक़े क़ोई…
और बिख़र ज़ाऊँ तो,
मुझक़ो न समेंटे क़ोई……