29 July 2026

11151 - 11155 इश्क़ हक़ीक़त याद क़यामत होंठ ज़र्फ़ आईना टूट लुत्फ़से ड़र ज़ब्ह क़ज़ा ज़ुल्म शायरी

 
11151
क़िया इश्क़-ए-मज़ाज़ीने,
हक़ीक़त आश्ना मुझक़ो ;
बुतोंने ज़ुल्म वो ढाया क़ि,
याद आया ख़ुदा मुझक़ो ll
ख़िज़्र नाग़पुरी

11152
तेरे हर ज़ुल्मक़ा मेरे ऊपर,
हिसाब तुझक़ो याद दिलाएंग़े…
क़यामत होनेसे पहले,
तुझक़ो हर बार यह एहसास दिलाएंग़े।

11153
ज़ुल्म सहक़े भी,
मैने होंठ सी लिए 'ग़ाज़ी' ;
एक़ ज़र्फ़ उनक़ा हैं,
एक़ ज़र्फ़ मेरा हैं……
                                शाहिद ग़ाज़ी

11154
आईना भी उन्हें देख़क़े,
शर्मा ग़या होग़ा l
उनक़े ज़ुल्म देख़क़े,
ख़ुद बख़ुद टूट ग़या होग़ा…

11155
ज़ुल्मसे ग़र ज़ब्हभी क़र दो,
मुझे परवा नहीं…
लुत्फ़से ड़रता हूँ,
ये मेरी क़ज़ा हो ज़ाएग़ा…
                                    बेख़ुद देहलवी