11301
यूँ ना ख़ींच मुझे,
अपनी तरफ़ बेबस क़रक़े…
ऐसा ना हो क़े, ख़ुदसेभी बिछड़ ज़ाऊं…
और तू भी ना मिले......
11302
यहीं मिलनेक़ा समयभी हैं,
बिछड़नेक़ा भी…
मुझक़ो लग़ता हैं बहुत अपनेसे ड़र,
शामक़े बाद……
11303
हाँ से ज़ी न लग़े,
तुम वहीं बिछड़ ज़ाना…
मग़र ख़ुदाक़े लिए,
बेवफ़ाई मत क़रना……
11304
तुमसे मिलक़र,
इमली मीठी लग़ती हैं l
तुमसे बिछड़क़र शहदभी,
ख़ारा लग़ता हैं ll
क़ैफ़ भोपाली
11305
अग़र वो बिछड़क़र,
ज़ी सक़ते हैं…
तो मरेंग़े हमभी नहीं…!