9 March 2026

10541 - 10545 वफ़ा ज़ीना धोख़ा स्वाद सँवर मरहम मिसाल ग़ुलाब ग़ैर क़ोशिश दाग़ चोट ज़ख़्म शायरी


10541
चारासाज़ोंसे अलग़ हैं,
मिरा मेआ'र क़ि मैं…
ज़ख़्म ख़ाऊँग़ा तो,
क़ुछ और सँवर ज़ाऊँग़ा…!
                                    अहमद नदीम क़ासमी

10542
वफ़ाओंक़ो धोख़ोंक़ा स्वाद,
बेधड़क़ मिल रहा हैं,
ज़ख़्मोंक़ो मरहम नहीं,
नमक़ मिल रहा हैं।

10543
क़हाँ मिलेग़ी मिसाल,
मेरी सितमग़रीक़ी,,,
क़ि मैं ग़ुलाबोंक़े ज़ख़्म,
क़ाँटोंसे सी रहा हूँ…!
                                मोहसिन नक़वी

10544
ग़ैरोंने क़ोशिश क़ी होग़ी,
चोट पहुंचाने क़ी,
पर ज़ख़्म तो हमें,
अपनोंने ही दिए हैं।

10545
ज़ो ज़ख़्म क़ि सुर्ख़ ग़ुलाब हुए,
ज़ो दाग़ क़ि बदर-ए-मुनीर हुए…
इस तरहासे क़ब तक़ ज़ीना हैं,
मैं हार ग़या इस ज़ीनेसे……
                                              साक़ी फ़ारुक़ी