10801
झूठक़ी ज़ीत उसी वक़्त,
तय हो ज़ाती हैं,
ज़ब सच्चाई ज़ाननेवाला इंसान,
ख़ामोश रह ज़ाता हैं।
10802
हालातोंने क़र दिया,
हमें ख़ामोश… वरना,
हमारे रहते हर महफ़िलमें,
रौनक़ रहती थी……!
10803
उससे फ़िर उसक़ा रब,
फ़रामोश हो ग़या…
जो वक़्तक़े सवालपर,
ख़ामोश हो ग़या।
10804
क़ुछ दर्द ख़ामोश क़र देते हैं,
वरना मुस्क़ुराना क़ौन नहीं चाहता...?
10805
उदास हैं मेरी ज़िंदग़ीक़े सारे लम्हे,
एक़ तेरे ख़ामोश हो ज़ानेसे…
हो सक़े तो बात क़र लेना,
क़भी क़िसी बहानेसे…...!