11581
हक़ीक़त-ए-अबदी हैं,
मक़ाम-ए-शब्बीरी…
बदलते रहते हैं,
अंदाज़-ए-क़ूफ़ी ओ शामी ll
अल्लामा इक़बाल
11582
हर हक़ीक़तक़ो,
ब-अंदाज़-ए-तमाशा देख़ा ll
ख़ूब देख़ा तिरे ज़ल्वोंक़ो,
मग़र क़्या देख़ा……?
ज़िग़र मुरादाबादी
11583
तिश्ना-ए-ख़ून-ए-तमाशा, ज़ो वो पानी माँग़े ;
आइना रुख़्सत-ए-अंदाज़-ए-रवानी माँग़े ll
मिर्ज़ा ग़ालिब
तिश्ना-ए-ख़ून-ए-तमाशा, ज़ो वो पानी माँग़े ;
आइना रुख़्सत-ए-अंदाज़-ए-रवानी माँग़े ll
मिर्ज़ा ग़ालिब
11584
अपनी बदली हुई,
नज़रोंक़े तक़ाज़े न छुपा l
मैं इस अंदाज़क़ा मफ़्हूम,
समझ सक़ता हूँ ll
साहिर लुधियानवी
11585
एक़ ही शय थी,
ब-अंदाज़-ए-दिग़र माँग़ी थी…
मैने बीनाई नहीं,
तुझसे नज़र माँग़ी थी……
इज़हार असर
एक़ ही शय थी,
ब-अंदाज़-ए-दिग़र माँग़ी थी…
मैने बीनाई नहीं,
तुझसे नज़र माँग़ी थी……
इज़हार असर