10511
याद क़रवाऊँग़ा तुझको तेरे ज़ख़्म,
तेरी सारी नेमतें ग़िनवाऊँग़ा...
अली ज़रयून
10512
उसकी याद आई तो,
क़ुछ ज़ख्म पुराने निक़ले ;
दिलकी मिट्टीको क़ुरेदा तो,
ख़ज़ाने निक़ले ll
ll10513
फूलतो सारे झड़ गए लेक़िन,
तेरी यादका ज़ख़्म हरा हैं ll
फूलतो सारे झड़ गए लेक़िन,
तेरी यादका ज़ख़्म हरा हैं ll
नासिर काज़मी
10514
मरहम ना सही,
एक़ ज़ख़्मही दे दो l
महसूस तो हो,
तुम्हे याद हैं हम ll
10115
अब तिरी यादसे,
वहशत नहीं होती मुझको l
ज़ख़्म खुलते हैं,
अज़िय्यत नहीं होती मुझको ll
शाहिद ज़की
अब तिरी यादसे,
वहशत नहीं होती मुझको l
ज़ख़्म खुलते हैं,
अज़िय्यत नहीं होती मुझको ll
शाहिद ज़की