28 July 2026

11146 - 11150 ज़िन्दग़ी बात लोग़ आदत दरबार सुनवाई आईने चेहरा नज़र फ़रेबी इंतिहा सायाँ ज़ुल्फ़े परीशाँ ज़ुल्म शायरी

 
11146
बात ये हैं क़ी,
लोग़ बदल ग़ए हैं...
ज़ुल्म ये हैं क़ी,
वो मानते भी नहीं...

11147
क़ुछ ज़ुल्म ओ सितम,
सहनेक़ी आदत भी हैं हमक़ो
क़ुछ ये हैं क़ि
दरबारमें सुनवाई भी क़म हैं
ज़िया ज़मीर

11148
ज़िन्दग़ी अपने आईनेमें,
तुझे अपना चेहरा नज़र नहीं आता,
ज़ुल्म क़रना तो तेरी आदत हैं,
ज़ुल्म सहना मग़र नहीं आता।
नरेश क़ुमार ‘शाद’

11149
ख़ुद-फ़रेबीमें मुब्तला रख़क़र,
ज़ुल्मक़ी तुमने इंतिहा क़ी हैं ll
अज़ीम हैंदराबादी

11150
इक़ न इक़ ज़ुल्मतसे,
ज़ब वाबस्ता रहना हैं ‘ज़ोश’,
ज़िन्दग़ीपर सायाँ-ए-ज़ुल्फ़े-ए-परीशाँ,
क़्यों न हो।
                                                        ज़ोश मलीहाबादी