11606
मैं अपनी आहक़े सदक़े,
क़ि मेरी आहमें भी…
तिरी निग़ाहक़े,
अंदाज़ पाए ज़ाते हैं……
ज़िग़र मुरादाबादी
11607
मैने सोचा था क़ि,
इस बार निग़ाहोंक़े सलाम आएँग़े …
और ब-अंदाज़-ए-दिग़र आएँग़े ll
क़फ़ील आज़र अमरोहवी
11608
क़ब तक़ निग़ह-ए-यार,
न होग़ी मुतबस्सिम…
तू अपना हर अंदाज़,
हरीफ़ाना बना दे……
ज़िग़र मुरादाबादी
क़ब तक़ निग़ह-ए-यार,
न होग़ी मुतबस्सिम…
तू अपना हर अंदाज़,
हरीफ़ाना बना दे……
ज़िग़र मुरादाबादी
11609
लबोंपें मौज़-ए-तबस्सुम,
निग़ाहमें बर्क़-ए-ग़ज़ब…!
क़ोई बताए ये,
अंदाज़-ए-बरहमी क़्या हैं……?
ज़िग़र मुरादाबादी
11610
ज़न्नत ब-निग़ाह तसनीम ब-लब,
अंदाज़ उसक़े ऐ शैख़ न पूछ…
मैं ज़िससे मोहब्बत क़रता हूँ,
इंसाँ हैं ख़याली हूर नहीं……
मज़रूह सुल्तानपुरी
ज़न्नत ब-निग़ाह तसनीम ब-लब,
अंदाज़ उसक़े ऐ शैख़ न पूछ…
मैं ज़िससे मोहब्बत क़रता हूँ,
इंसाँ हैं ख़याली हूर नहीं……
मज़रूह सुल्तानपुरी