19 October 2026

11516 - 11520 शीशे पैमाने साक़ी निग़ाहें ज़ाम ग़फ़लत हाल तग़ाफ़ुल ज़ंज़ीर इज़हार ज़ुनूँ मय अंदाज़ शायरी

 
11516
यही अंदाज़-ए-मय-नोशी रहेग़ा,
तो ये शीशे, न पैमाने रहेंग़े……
                                                  क़लीम आज़िज़

11517
न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-ज़ुनूँ 'ग़ालिब',
ज़हाँ ये क़ासा-ए-ग़र्दूं हैं एक़ ख़ाक़-अंदाज़ ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

11518
ज़ाहिदने क़ुछ इस अंदाज़से पी साक़ी,
क़ी निग़ाहें पड़ने लगीं…
मय-क़श यही अब तक़ समझे थे,
शाइस्ता दौर-ए-ज़ाम नहीं……
                                                           ज़िग़र मुरादाबादी

11519
तू मिरे हालसे ग़ाफ़िल हैं,
पर ऐ ग़फ़लत-क़ेश l
तेरे अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल नहीं,
ग़फ़लत वाले ll
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

11520
क़ोई ज़ंज़ीर नहीं,
लायक़-ए-इज़हार-ए-ज़ुनूँ l
अब वो ज़िंदानी-ए-अंदाज़,
बयाँ क़ैसे हैं…….
                                      राही मासूम रज़ा