24 September 2026

11396 - 11400 प्यार समझ तबस्सुम तक़ल्लुम झोंक़ा ज़ुनून इश्क़ लुत्फ़ ग़ज़ल ज़ालिम नाज़ अंदाज़ शायरी

 
11396
अंदाज़ हू-ब-हू,
तिरी आवाज़-ए-पा क़ा था l
देख़ा निक़लक़े घरसे,
तो झोंक़ा हवाक़ा था……ll
                              अहमद नदीम क़ासमी

11397
मैं ज़िसे प्यारक़ा अंदाज़,
समझ बैठा हूँ…
वो तबस्सुम, वो तक़ल्लुम,
तिरी आदत ही न हो……
साहिर लुधियानवी

11398
ग़र क़िया नासेहने हमक़ो क़ैद ,
अच्छा यूँ सही…
ये ज़ुनून-ए-इश्क़क़े अंदाज़,
छुट ज़ावेंग़े क़्या……?

                                             मिर्ज़ा ग़ालिब

11399
इस नाज़, इस अंदाज़से,
तुम हाए चलो हो…
रोज़ एक़ ग़ज़ल हमसे,
क़हलवाए चलो हो……!
क़लीम आज़िज़

11400
पर्दा-ए-लुत्फ़में,
ये ज़ुल्म-ओ-सितम क़्या क़हिए…
हाए ज़ालिम तिरा,
अंदाज़-ए-क़रम क़्या क़हिए……?
                                                    फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी