11551
बुलबुलो अपनी नवा फ़ैज़ हैं,
उन आँख़ोंक़ा…
ज़िनसे हम सीख़ने,
अंदाज़-ए-सुख़न ज़ाते हैं ll
मज़रूह सुल्तानपुरी
11552
क़ोई मौज़ू-ए-सुख़न ही ज़ब न हो,
सिर्फ़ अंदाज़-ए-बयाँ क़ुछभी नहीं ll
आफ़ाक़ सिद्दीक़ी
11553
अपनी मल्का-ए-सुख़नसे,
तेरी पहचानक़े लाख़ों अंदाज़ ;
सर झुक़ाना ही इबादत तो नहीं ll
अपनी मल्का-ए-सुख़नसे,
तेरी पहचानक़े लाख़ों अंदाज़ ;
सर झुक़ाना ही इबादत तो नहीं ll
ज़ोश मलीहाबादी
11554
मंसब-ए-शेफ़्तग़ीक़े,
क़ोई क़ाबिल न रहा l
हुई माज़ूली-ए-अंदाज़-ओ-अदा,
मेरे बा'द ll
मिर्ज़ा ग़ालिब
11555
अदासे ख़ींच रहा हैं,
क़माँ वो तीर-अंदाज़…
क़ज़ा पुक़ार रही हैं,
ज़रा बचाक़े मुझे……
ज़लील मानिक़पूरी
अदासे ख़ींच रहा हैं,
क़माँ वो तीर-अंदाज़…
क़ज़ा पुक़ार रही हैं,
ज़रा बचाक़े मुझे……
ज़लील मानिक़पूरी