25 October 2026

11541 - 11545 रंग़ रूप सज़ चाल शब तमाशा चमन नज़र ज़ुनून ख़िज़ाँ बहार अंदाज़ शायरी

 
11541
शाख़ोंक़ा रंग़-रूप,
ख़िज़ाँ ले ग़ई मग़र…
अंदाज़ आज़भी वहीं,
अर्बाब-ए-फ़न सा हैं ll
                                   अदा ज़ाफ़री

11542
क़बा-ए-ज़र्द,
निग़ार-ए-ख़िज़ाँपें सज़ती थी l
तभी तो चालक़ा अंदाज़,
ख़ुसरवाना था ll
इफ़्तिख़ार आरिफ़

11543
ये बयाबाँ, ये शब-ए-माह,
ये ख़ुनक़ी, ये हवा…
ऐ ख़िज़ाँ तुझक़ोभी,
अंदाज़-ए-बहार आ ही ग़या 
ll
                                              शफ़ीक़ ज़ौनपुरी

11544
फ़िर इस अंदाज़से बहार आई,
क़ि हुए मेहर-ओ-मह तमाशाई ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

11545
ठहरक़े मुझपें ही,
अहल-ए-चमनक़ी नज़रोंने…
मिरे ज़ुनूनसे,
अंदाज़-ए-बहार क़िया 
ll
                                        कृष्ण बिहारी नूर