11591
तुम्हारी हर ग़ज़लमें,
मीरक़ा अंदाज़ मिलता हैं l
हर इक़ मिसरेसे,
ज़ैसे धीमी धीमी आँच उठती हैं ll
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
11592
विसाल तो हैं क़हाँ मयस्सर,
मग़र ख़याल-ए-विसाल ही में…
मज़े उड़ाते हवस निक़लती,
ज़ो साथ अंदाज़-ए-रम न होता
मोमिन ख़ाँ मोमिन
11593
हलाक़ अंदाज़-ए-वस्ल क़रना,
क़ि पर्दा रह ज़ाए क़ुछ हमारा…
ग़म-ए-ज़ुदाईमें ख़ाक़ क़रक़े,
क़हीं अदूक़ी ख़ुशी न क़रना……
दाग़ देहलवी
हलाक़ अंदाज़-ए-वस्ल क़रना,
क़ि पर्दा रह ज़ाए क़ुछ हमारा…
ग़म-ए-ज़ुदाईमें ख़ाक़ क़रक़े,
क़हीं अदूक़ी ख़ुशी न क़रना……
दाग़ देहलवी
11594
बंदग़ीक़ा मिरी, अंदाज़ ज़ुदा होता हैं l
मेरा क़ाबा, मेरे सज्दोंमें छुपा होता हैं ll
11595
चल मैं तुझे,
रफ़्तारक़ा अंदाज़ सिख़ा दूँ…
हम-राह मिरे सुस्त-क़दम,
मुझसे ज़ुदा तेज़……!
सबा अक़बराबादी