11516
यही अंदाज़-ए-मय-नोशी रहेग़ा,
तो ये शीशे, न पैमाने रहेंग़े……
क़लीम आज़िज़
11517
न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-ज़ुनूँ 'ग़ालिब',
ज़हाँ ये क़ासा-ए-ग़र्दूं हैं एक़ ख़ाक़-अंदाज़ ll
मिर्ज़ा ग़ालिब
11518
ज़ाहिदने क़ुछ इस अंदाज़से पी साक़ी,
क़ी निग़ाहें पड़ने लगीं…
मय-क़श यही अब तक़ समझे थे,
शाइस्ता दौर-ए-ज़ाम नहीं……
ज़िग़र मुरादाबादी
ज़ाहिदने क़ुछ इस अंदाज़से पी साक़ी,
क़ी निग़ाहें पड़ने लगीं…
मय-क़श यही अब तक़ समझे थे,
शाइस्ता दौर-ए-ज़ाम नहीं……
ज़िग़र मुरादाबादी
11519
तू मिरे हालसे ग़ाफ़िल हैं,
पर ऐ ग़फ़लत-क़ेश l
तेरे अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल नहीं,
ग़फ़लत वाले ll
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
11520
क़ोई ज़ंज़ीर नहीं,
लायक़-ए-इज़हार-ए-ज़ुनूँ l
अब वो ज़िंदानी-ए-अंदाज़,
बयाँ क़ैसे हैं…….
राही मासूम रज़ा
क़ोई ज़ंज़ीर नहीं,
लायक़-ए-इज़हार-ए-ज़ुनूँ l
अब वो ज़िंदानी-ए-अंदाज़,
बयाँ क़ैसे हैं…….
राही मासूम रज़ा