10 August 2026

11191 - 11195 ज़िंदग़ी नींद शब पल मुँह क़समें वादा सबक़ बहार आलम ख़िज़ाँ वस्ल फ़िक़्र ज़ुदाई शायरी

 
11191
थी वस्लमेंभी,
फ़िक़्र-ए-ज़ुदाई तमाम शब…
वो आए तो भी,
नींद न आई तमाम शब……
                                        मोमिन ख़ाँ मोमिन

11192
ग़ुज़रते पलोंने,
बहुत क़ुछ सिख़ा दिया,
ज़ुदाईभी ज़िंदग़ीक़ा,
एक़ सबक़ निक़ली।

11193
वस्लमें रंग़ उड़ ग़या मेरा,
क़्या ज़ुदाईक़ो मुँह दिख़ाऊँग़ा ll
                                                मीर तक़ी मीर

11194
साथ ज़ीने मरनेकी,
क़समें ख़ाई थीं हमने,
अब ज़ुदाईमेंभी,
वो वादा निभाना हैं हमने।

11195
मिरी बहारमें,
आलम ख़िज़ाँक़ा रहता हैं l
हुआ ज़ो वस्ल तो,
ख़टक़ा रहा ज़ुदाईक़ा ll
                                 ज़लील मानिक़पूरी