8 November 2026

11606 - 11610 मोहब्बत आह सलाम दिग़र यार मुतबस्सिम हरीफ़ाना लब मौज़ ज़न्नत तबस्सुम ग़ज़ब निग़ाह अंदाज़ शायरी

 
11606
मैं अपनी आहक़े सदक़े,
क़ि मेरी आहमें भी…
तिरी निग़ाहक़े,
अंदाज़ पाए ज़ाते हैं……
                                  ज़िग़र मुरादाबादी

11607
मैने सोचा था क़ि,
इस बार निग़ाहोंक़े सलाम आएँग़े …
और ब-अंदाज़-ए-दिग़र आएँग़े ll
क़फ़ील आज़र अमरोहवी

11608
क़ब तक़ निग़ह-ए-यार,
न होग़ी मुतबस्सिम…
तू अपना हर अंदाज़,
हरीफ़ाना बना दे……
                            ज़िग़र मुरादाबादी

11609
लबोंपें मौज़-ए-तबस्सुम,
निग़ाहमें बर्क़-ए-ग़ज़ब…!
क़ोई बताए ये,
अंदाज़-ए-बरहमी क़्या हैं……?
ज़िग़र मुरादाबादी

11610
ज़न्नत ब-निग़ाह तसनीम ब-लब,
अंदाज़ उसक़े ऐ शैख़ न पूछ…
मैं ज़िससे मोहब्बत क़रता हूँ,
इंसाँ हैं ख़याली हूर नहीं……
                                              मज़रूह सुल्तानपुरी