30 October 2026

11566 - 11570 नज़र दम ज़ुल्फ़ परेशाँ दास्तान ग़म बातें नींद आँख़ सुब्ह शाम अंदाज़ शायरी

 
11566
दो दिन आया हैं,
तू नज़र दम-ए-सुब्ह…
यही अंदाज़,
और यही अंदाम……
                               मिर्ज़ा ग़ालिब

11567
निक़हत-ए-ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ,
दास्तान-ए-शाम-ए-ग़म…l
सुब्ह होने तक़,
इसी अंदाज़क़ी बातें क़रो…ll
फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

11568
नींदभरी आँख़ोंसे,
चूमा दियेने, सूरज़क़ो 
l
और फ़िर ज़ैसे शामक़ो अब नहीं ज़लना,
ख़ींचली इस अंदाज़में चुप ll
                                                           उबैदुल्लाह अलीम

11569
वहीं ख़लिश, वहीं सोज़िश,
वहीं तपिश, वहीं दर्द…
हमें सहर भी,
ब-अंदाज़-ए-शाम होती हैं ll
बहज़ाद लख़नवी

11570
शामक़ा बादल,
नए नए अंदाज़ दिख़ाया क़रता हैं l
क़भी वो नन्हा बच्चा बनक़र,
मेरे सामने आता हैं ll
                                                        मुनीर नियाज़ी