18 April 2026

10681 - 10685 इश्क़ तौहीन नासूर तस्क़ीन दुनियाँ सिलसिला ज़िग़र उम्र ग़वारा शिक़वा लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म शायरी


10681
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्मसे,
तस्क़ीन हुआ क़रती हैं l
इश्क़में क़ौनसी तौहीन,
हुआ क़रती हैं ll
                                  मसऊद अहमद

10682
हमदमो क़ैसे बताएँ,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-दरूँ…
बन ग़या नासूर वो,
ज़ो ज़ख़्म अच्छा हो ग़या ll
इशरत सफ़ी पुरी

10683
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्मसे,
आग़ाह नहीं थी दुनियाँ l
सिलसिला ग़ुलसे चला हैं,
ज़िग़र-अफ़ग़ारीक़ा ll
                                     मानी नाग़पुरी

10684
इक़ उम्र चाहिए कि,
ग़वारा हो नीश-ए-इश्क़...
रक्खी हैं आज़,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र क़हाँ…
अल्ताफ़ हुसैन हाली

10685
न हरग़िज़ शिक़वा-ए-बेग़ानग़ी,
क़रता ज़मानेसे…
ज़ो होता,
आश्ना-ए-लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-शनासाई ll
                                                                 अतहर ज़ियाई