23 October 2026

11531 - 11535 मंज़िल शौक़ ख़ामोश एहसास ख़ामुशी सदा अज़ब राज़ ज़नाज़ा ग़ली दुनियाँ अन्दाज़ शायरी

 
11531
अन्दाज़ क़ुछ अलग़ हैं मेरे सोचनेक़ा,
सबक़ो मंज़िलक़ा शौक़ हैं और मुझे रास्तोंक़ा ..
ये दुनियाँ इसलिए बुरी नहीं क़े यहाँ बुरे लोग़ ज्यादा हैं।
बल्क़ि इसलिए बुरी हैं क़ि यहाँ अच्छे लोग़ ख़ामोश हैं!

11532
क़ाश दुनियाँ मिरे,
एहसासक़ो वापस क़र दे…
ख़ामुशीक़ा वहीं अंदाज़,
सदाओं ज़ैसा……
 मोहसिन नक़वी

11533
देनेवालेने दिया सब क़ुछ,
अज़ब अंदाज़से…
सामने दुनियाँ पड़ी हैं,
और उठा सक़ते नहीं...!
                                बशीर बद्र

11534
सारी दुनियाँ हैं, एक़ पर्दा-ए-राज़,
उफ़ रे तेरे हिज़ाबक़े अंदाज़......!
ज़ोश मलीहाबादी

11535
ज़नाज़ा रोक़क़र मेरा,
वो इस अंदाज़से बोले…
ग़ली हमने क़ही थी,
तुम तो दुनियाँ छोड़े ज़ाते हो……
                                                  सफ़ी लख़नवी