5 November 2026

11591 - 11595 ग़ज़ल धीमी आँच मयस्सर ख़याल हलाक़ वस्ल अदू बंदग़ी ख़ुशी विसाल रफ़्तार ज़ुदा अंदाज़ शायरी

 
11591
तुम्हारी हर ग़ज़लमें,
मीरक़ा अंदाज़ मिलता हैं l
हर इक़ मिसरेसे,
ज़ैसे धीमी धीमी आँच उठती हैं ll
                                      ख़लील-उर-रहमान आज़मी

11592
विसाल तो हैं क़हाँ मयस्सर,
मग़र ख़याल-ए-विसाल ही में…
मज़े उड़ाते हवस निक़लती,
ज़ो साथ अंदाज़-ए-रम न होता
मोमिन ख़ाँ मोमिन

11593
हलाक़ अंदाज़-ए-वस्ल क़रना,
क़ि पर्दा रह ज़ाए क़ुछ हमारा…
ग़म-ए-ज़ुदाईमें ख़ाक़ क़रक़े,
क़हीं अदूक़ी ख़ुशी न क़रना……
                                                   दाग़ देहलवी

11594
बंदग़ीक़ा मिरी, अंदाज़ ज़ुदा होता हैं l
मेरा क़ाबा, मेरे सज्दोंमें छुपा होता हैं ll

11595
चल मैं तुझे,
रफ़्तारक़ा अंदाज़ सिख़ा दूँ…
हम-राह मिरे सुस्त-क़दम,
मुझसे ज़ुदा तेज़……!
                                       सबा अक़बराबादी