21 April 2026

10696 - 10700 दिल बहार तमन्ना चाँद सितारों राहत महफ़िल ग़ुलिस्ताँ हुनर ज़िग़र रुख़्सार ज़ख़्म शायरी

 

10696
ज़ख़्म पाए हैं,
बहारोंक़ी तमन्ना क़ी थी…
मैने चाँद और सितारोंक़ी,
तमन्ना क़ी थी……!
                                      साहिर लुधियाँनवी

10697
नहीं ज़रीयाँ-ए-राहत,
ज़राहत-ए-पैक़ाँ…
वो ज़ख़्म-ए-तेग़ हैं ज़िसक़ो,
क़ि दिल-क़ुशा क़हिए……
मिर्ज़ा ग़ालिब

10698
हुवैदा आज़ अपने,
ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ क़रक़े छोड़ूँग़ा…
लहू रो रोक़े महफ़िलक़ो,
ग़ुलिस्ताँ क़रक़े छोड़ूँग़ा…
                                       अल्लामा इक़बाल

10699
हैं ज़राहत और ज़ख़्म और घाव रीश…
भैंसक़ो क़हते हैं भाई ग़ाव मेश ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

10700
अब ज़ाक़े क़ुछ ख़ुला,
हुनर-ए-नाख़ुन-ए-ज़ुनूँ…
ज़ख़्म-ए-ज़िग़र हुए,
लब-ओ-रुख़्सारक़ी तरह…
                                       मज़रूह सुल्तानपुरी