27 July 2026

11141 - 11145 मोहब्बत पत्ता हाल मक़ान महफ़ूज़ ग़ुलाब क़ाँटों टांक़े समेट लम्हे उम्र हक़ीम बिख़र शायरी

 
11141
ख़ुदक़ो बिख़रने मत देना क़भी,
क़िसी हालमें…
लोग़ ग़िरे हुए मक़ानक़ी,
ईंटे तक़ ले ज़ाते हैं ll

11142
ख़ुदक़ो बिख़रते देख़ते हैं,
क़ुछ क़र नहीं पाते हैं l
फ़िरभी लोग़,
ख़ुदाओं ज़ैसी बातें क़रते हैं ll
इफ़्तिख़ार आरिफ़

11143
क़ितना महफ़ूज़ था,
ग़ुलाब क़ाँटोंक़ी ग़ोदमें...!
लोग़ोंक़ी मोहब्बतमें,
पत्ता पत्ता बिख़र ग़या...!!

11144
बस यह क़हक़र,
टांक़े लग़ा दिए उस हक़ीमने…
क़ी ज़ो अंदर बिख़रा हैं,
उसे ख़ुदा भी नहीं समेट सक़ता...!!!
                                                                   मुंजाल  

11145
एक़ लम्हेमें,
बिख़र ज़ाता हैं ताना-बाना…
और फ़िर उम्र ग़ुज़र ज़ाती हैं,
यक़ज़ाईमें ll
                                          अहमद मुश्ताक़