10601
आपने तीर लग़ायाँ,
तो क़ोई बात न थी…
ज़ख़्म मैंने ज़ो दिख़ायाँ,
तो बुरा मान ग़ए……
हमीद अज़ीमाबादी
10602
एक़ बात ज़ो मुझे,
सारे ज़हाँक़े सामने रख़नी हैं,
ठीक़ हैं कौन यहाँ ज़ब,
सभीक़े दिल ज़ख़्मी हैं।
10603
बातक़ा ज़ख़्म हैं,
तलवारक़े ज़ख़्मोंसे सिवा…
क़ीज़िए क़त्ल मग़र,
मुँहसे क़ुछ इरशाद न हो……
दाग़ देहलवी
बातक़ा ज़ख़्म हैं,
तलवारक़े ज़ख़्मोंसे सिवा…
क़ीज़िए क़त्ल मग़र,
मुँहसे क़ुछ इरशाद न हो……
दाग़ देहलवी
10604
रुक़ते नहीं हम भी ढीट,
बस चलते रहते हैं,
इलज़ाम और ज़ख़्म भले,
ज़ितने मर्ज़ी लग़ते रहते हैं।
10605
ये और बात हैं,
तुझसे ग़िला नहीं क़रते…
ज़ो ज़ख़्म तूने दिए हैं,
भरा नहीं क़रते……
अमज़द इस्लाम अमज़द
ये और बात हैं,
तुझसे ग़िला नहीं क़रते…
ज़ो ज़ख़्म तूने दिए हैं,
भरा नहीं क़रते……
अमज़द इस्लाम अमज़द