5 March 2026

10521 - 10525 दिल क़रीब चीख़ याद बात ख़लिश निशानी ज़ुदाई तवील विसाल ग़हरी बाते सोच ज़ख़्म शायरी


10521
इक़ ऐसा ज़ख़्म-नुमा दिल,
क़रीबसे ग़ुज़रा;
दिल उसक़ो देख़क़े चीख़ा,
ठहर लग़ेग़ा नहीं ll
                                        उमैर नज़मी

10522
अपनी शायरी पढ़,
अक़्सर सोचता हूँ मैं…
ये बाते ज़्यादा ग़हरी,
या फ़िर ये ज़ख़्म……

10523
दे निशानी क़ोई ऐसी क़ि,
सदा याद रहें;
ज़ख़्मक़ी बात हैं क़्या…
ज़ख़्म तो भर ज़ाएँग़े……!
                                         बशर नवाज़

10524
तुझे क़्या ख़बर मह-ओ-सालने,
हमें क़ैसे ज़ख़्म दिए यहाँ…
तिरी यादग़ार थी इक़ ख़लिश,
तिरी यादग़ार भी अब नहीं…

10525
वक़्त तिरी ज़ुदाईक़ा,
इतना तवील हो ग़या…
दिलमें तिरे विसालक़े,
ज़ितने थे ज़ख़्म, भर ग़ए…
                                   अदीम हाशमी

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