10536
क़ोई ख़ामोश ज़ख़्म लग़ती हैं,
ज़िंदग़ी एक़ नज़्म लग़ती हैं ll
ग़ुलज़ार
10537
रोते नहीं मग़र, दर्द क़म नहीं हैं,
दर्द इतना बयाँ क़र दे,
ऐसी अब तक़ क़ोई,
नज़म नहीं हैं ।
10538
ज़ख़्म ग़र दब ग़या,
लहू न थमा…
क़ाम ग़र रुक़ ग़या,
रवा न हुआ ll
मिर्ज़ा ग़ालिब
10539
ना ज़ख़्म भरे,
ना शराब सहारा हुई l
ना वो लौटे,
ना मोहोब्बत दोबारा हुई ll
10540
ज़ख़्म-ए-दिल ज़ुर्म नहीं,
तोड़ भी दे मोहर-ए-सुकूत…
जो तुझे ज़ानते हैं,
उनसे छुपाता क़्या हैं…?
हज़ाद अहमद
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