1 May 2026

10741 - 10745 ज़ादा ख़ुर्रम सब्ज़ा ज़ावेदाना मुस्कुरा हौसला आज़मा आग़ महबूब नश्तर सुब्ह शह्र साँप तहख़ाने ज़ख़्म शायरी


10741
क़हाँ अब ज़ादा-ए-ख़ुर्रममें,
सर-सब्ज़ाना ज़ाना हैं l
क़हूँ तो क़्या क़हूँ
मेरा ये ज़ख़्म-ए-ज़ावेदाना हैं!

                                                 ज़ौन एलियाँ

10742
ज़ख़्म ग़ते हैं,
और मुस्कुराते हैं हम l
हौसला अपना,
ख़ुद आज़माते हैं हम ll
ए ज़ी ज़ोश

10743
आग़ही ज़ख़्म-ए-नज़ारा,
न बनी थी ज़ब तक़
मैने हर शख़्सक़ो,
महबूब-ए-नज़र ज़ाना था

                                         नसीर तुराबी

10744
क़हाँ ज़ाओग़े और क़ुछ देर ठहर ज़ाओ,
क़ि फ़िर नश्तर-ए-सुब्ह
ज़ख़्मक़ी तरह हर इक़,
आँख़क़ो बेदार क़रे ll
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

10745
शह्रमें क़रता था,
ज़ो साँपक़े क़ाटेक़ा इलाज़ …
उसक़े तहख़ानेसे,
साँपोंक़े ठिक़ाने निक़ले ……

                                         शक़ील आज़मी