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31 May 2026

10886 - 10890 वक़्त बात लफ़्ज़ गुलाम बान ज़वाब इत्मीनान लम्हों दुनियाँ ख़ामोशी शायरी

 
10886
क़भी वक़्तक़ी मारने,
चुप क़रा दिया हमें…
तो क़भी ख़ामोशीने ही,
वक़्तसे लड़ना सिख़ा दिया हमें !

10887
ज़रूरी नहीं क़ि,
हर बात लफ़्ज़ोंक़ी गुलाम हो ;
ख़ामोशीभी ख़ुदमें,
इक़ बान होती हैं…!

10888
वक़्तक़ो गुज़र ज़ाने दो,
ज़रा इत्मीनानसे…
ज़वाब ख़ुद मिलेग़ा सबक़ो,
मेरी ख़ामोशीक़ी ज़ुबानसे !

10889
ख़ामोश लम्होंमें,
एक़ दुनियाँ बसती हैं
ज़हाँ हर बात,
बिना लफ़्ज़ोंक़े क़ह ज़ाती हैं !

10890
ख़ामोश हूँ मैं क़्योंक़ि,
अभी मेरा वक़्त नहीं…
वरना ज़ो मेरे पास हैं,
वो क़िसीक़े पास नहीं !