11181
क़्यूँ बढ़ाते हो,
इख़्तिलात बहुत…
हमक़ो ताक़त नहीं,
ज़ुदाई क़ी……
अल्ताफ़ हुसैन हाली
11182
दिलने क़हा था,
तू हमेशा रहेग़ा पास,
वक़्तने क़र दिया हैं,
ज़ुदाईक़ा एहसास।
11183
महिने वस्लक़े,
घड़ियोंक़ी सूरत उड़ते ज़ाते हैं…
मग़र घड़ियाँ ज़ुदाईक़ी,
गुज़रती हैं महिनोंमें ll
अल्लामा इक़बाल
11184
ज़ुदाईने लिख़ दी हैं,
दर्दक़ी नई क़हानी…
हर पल तेरी तलाशमें,
क़टती हैं ये ज़िंदग़ानी ll
11185
टुक़ ख़बर ले क़ि,
हर घड़ी हमक़ो...
अब ज़ुदाई,
बहुत सताती हैं l
ख़्वाज़ा मीर ‘दर्द’
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