2 August 2026

11161 - 11165 मोहोबत पैरहन ख़ुशबू घबरा भूल ग़ुरूर ज़ंग़ धमक़ि बदमाशि क़दर शिक़वा-ए-ज़ुदाई शायरी

 

11161
ज़ब अपने पैरहनसे,
ख़ुशबू तुम्हारी आई…
घबराक़े भूल बैठे हम,
शिक़वा-ए-ज़ुदाई……!

11162
क़ोई रूठे तो,
उसे ज़ल्दी मना लिया क़रो…l
ग़ुरूरक़ी ज़ंग़में अक़्सर,
ज़ुदाई ज़ीत ज़ायाँ क़रती हैं ll

11163
धमक़ियाँ देता हैं,
और वो भी ज़ुदाईक़ी...
मोहोबतमें भी देख़ो…
बदमाशियाँ मेरे याँरक़ी…...

11164
आँख़ें हैं कि,
ख़ाली नहीं रहती हैं, लहूसे…
और ज़ख़्म-ए-ज़ुदाई हैं,
भरभी नहीं जाता……
अहमद फ़राज़

11165
लाऊँग़ा क़हाँसे,
ज़ुदाईक़ा हौसला…
क़्यों क़ोंई इस क़दर,
मेरे क़रीब आ रहा हैं ?