5 September 2026

11311 - 11315 इश्क़ मुहब्बत आशिक़ शिक़वा फ़ना होठ ख़िलाफ़ फ़िक़्र रिश्ता एहसास बात ज़ुर्म क़बूल दिल इज़ाज़त शायरी

 
11311
इश्क़ने क़ब इज़ाज़त ली हैं,
आशिक़ोंसे,
वो होता हैं और…
होक़र ही रहता हैं

11312
शिक़वा तो बहुत हैं,
फ़ना होने नहीं क़र सक़ते,
मेरे होठोंक़ो इज़ाज़त नहीं,
तेरे ख़िलाफ़ बोलनेक़ी...!

11313
तुम्हारी फ़िक़्र क़रनेक़े लिए,
हमारा रिश्ता होना ज़रूरी तो नहीं…
एहसासक़ी ही तो बात हैं,
तुम्हारी इज़ाज़तभी ज़रूरी नहीं…

11314
चलो, ये ज़ुर्मभी क़बूल हैं,
ज़ो तेरी इज़ाज़तक़े बग़ैर,
तुझे अपना समझा…

11315
हमने क़्या उससे,
मुहब्बतक़ी इज़ाज़त ली थी l
दिलशिक़न ही सही,
पर बात बज़ा हैं उसक़ी……ll

4 September 2026

11306 - 11310 बोसा मोहब्बत बरहम बेताबी ख़ता चाह नज़र ज़ुल्फ़ तबाह ख़ूबसूरत दाम साक़ी इज़ाज़त शायरी

 
11306
न हो बरहम ज़ो बोसा,
बे-इज़ाज़त ले लिया मैने…
चलो ज़ाने दो,
बेताबीमें ऐसा हो ही ज़ाता हैं...!
                                             ज़लाल लख़नवी

11307
सुनो,
एक़ ख़ता हो ग़ई हैं,
हमने तुमक़ो…
तुमसे चुराया हैं,
तुम्हारी इज़ाज़तक़े बग़ैर…

11308
मैं चाहता हूँ क़ि,
तुमही मुझे इज़ाज़त दो…
तुम्हारी तरहसे क़ोई,
ग़ले लगाए मुझे……
                                        बशीर बद्र

11309
इज़ाज़त तो हमने भी न दी थी,
उसे मोहब्बतक़ी,
बस वो नज़र उठाते ग़ए,
और हम तबाह होते ग़ए !

11310
इज़ाज़त हो तो,
मैं तस्दीक़ क़र लूँ, तेरी ज़ुल्फ़ोंसे…
सुना हैं ज़िंदगी इक़,
ख़ूबसूरत दाम हैं साक़ी
                                                   अब्दुल हमीद अदम

3 September 2026

11301 - 11305 बेबस ख़ींच समय शाम ड़र बेवफ़ाई मीठी शहद इमली ख़ारा बिछड़ शायरी


11301
यूँ ना ख़ींच मुझे,
अपनी तरफ़ बेबस क़रक़े… 
ऐसा ना हो क़े, ख़ुदसेभी बिछड़ ज़ाऊं…
और तू भी ना मिले......

11302
यहीं मिलनेक़ा समयभी हैं,
बिछड़नेक़ा भी…
मुझक़ो लग़ता हैं बहुत अपनेसे ड़र,
शामक़े बाद……

11303
हाँ से ज़ी न लग़े,
तुम वहीं बिछड़ ज़ाना…
मग़र ख़ुदाक़े लिए,
बेवफ़ाई मत क़रना……

11304
तुमसे मिलक़र,
इमली मीठी लग़ती हैं l
तुमसे बिछड़क़र शहदभी,
ख़ारा लग़ता हैं ll
क़ैफ़ भोपाली

11305
अग़र वो बिछड़क़र,
ज़ी सक़ते हैं…
तो मरेंग़े हमभी नहीं…!

1 September 2026

11296 - 11300 दिल याँद ज़िंदग़ी सलीक़ा ख़बर शाम नग़्मा अंदाज़ हमसफ़र बिछड़ शायरी

 
11296
क़्या लिख़ूँ,
अपनी ज़िंदग़ीक़े बारेमें… 
वो लोग़ हीं बिछड़ ग़ए,
ज़ो ज़िंदग़ी हुआ क़रते थे......

11297
मुद्दतें हो ग़ईं,
बिछड़े हुए तुमसे लेक़िन…
आज़ तक़ दिलसे मिरे,
याँद तुम्हारी न ग़ई……
अख़्तर शीरानी

11298
ज़ो वो मिरे न रहें,
मैं भी क़ब क़िसीक़ा रहा…
बिछड़क़े उनसे,
सलीक़ा न ज़िंदग़ीक़ा रहा……

11299
तुझसे बिछड़ना,
क़ोई नया हादसा नहीं…
ऐसे हज़ारों क़िस्से,
हमारी ख़बरमें हैं……
आशुफ़्ता चंग़ेज़ी

11300
शाम आई तो बिछड़े हुए हमसफ़र,
आँसुओंसे इन आँख़ोंमें आने लग़े,
आँख़ें मंज़र हुई, क़ाम नग़्मा हुए,
घरक़े अंदाज़ हीं घरसे ज़ाते रहें।

30 August 2026

11291 - 11295 दुनियाँ ज़िन्दग़ी साँस सज़ा प्यार रूह मुमक़िन नज़दीक़ बिछड़ शायरी


11291
हुआ हैं तुझसे,
बिछड़नेक़े बाद ये मालूम…
क़ि तू नहीं था,
तिरे साथ एक़ दुनियाँ थी ll
                                        अहमद फ़राज़

11292
हम आपक़े प्यारमें क़ुछ क़र न ज़ायें,
बनक़े रूह बिछड़ ना ज़ायें…
भूलना मुमक़िन नहीं हैं आपक़ो,
मरनेसे पहले क़हीं मर ना ज़ायें……

11293
बहुत नज़दीक़ आती ज़ा रहीं हो…
बिछड़नेक़ा इरादा क़र लिया क़्या……
                                                                         ज़ौन एलिया

11294
बिछड़क़े तुमसे ज़िन्दग़ी सज़ा लग़ती हैं,
ये साँसभी ज़ैसे मुझसे ख़फ़ा लग़ती हैं,
अग़र उम्मीद-ए-वफ़ा क़रूँ तो क़िससे क़रूँ,
मुझक़ो तो मेरी ज़िन्दग़ी भी बेवफ़ा लग़ती हैं।

11295
अभी मंज़र बदलते ही,
बदल ज़ाएँग़े सब चेहरे…
बिछड़ते वक़्तक़ा ग़म हैं,
अभी तू नम न क़र आँखें……
                                                  रेनू नय्यर

29 August 2026

11286 - 11290 दिल एहसास ज़ीवन सपना ख़ुशी दर्द ग़म इम्कान ख़ुश बिछड़ शायरी

 
11286  
बिछड़नेक़ा दर्द क़ुछ यूँ मिला,
हर ख़ुशीमें भी अब ग़मसा ख़िला ll

11287
अबक़े 'वक़ार' ऐसे बिछड़े हैं…
मिलनेक़ा इम्कान नहीं हैं ll
वक़ार मानवी

11288
बिछड़ना सिर्फ़,
दूर होना नहीं होता,
ये वो एहसास हैं, ज़ो दिलमें,
हमेशाक़े लिए बस ज़ाता हैं।l

11289
उनसे 'शरर' क़ुछ ऐसे बिछड़े…
ज़ीवनक़ा हर सपना बिख़रा ll
शरर फ़तेह पुरी

11290
मुझसे बिछड़क़े रहना तुम्हे,
अच्छा लग़ता हैं ना,
तो ज़ाओ ख़ुश रहो,
मुझेभी तुम्हारी ख़ुशी,
अच्छी लग़ती हैं…!

28 August 2026

11281 - 11285 शज़र परिंदे मिलाप एहसास ख़ास मुक़म्मल पल टूट भुला हिस्स-ए-मिज़ाह बिछड़ शायरी

11281
बिछड़क़े तुझसे न देख़ा ग़या,
क़िसीक़ा मिलाप…
उड़ा दिए हैं परिंदे,
शज़रपें बैठे हुए……
                                          अदीम हाशमी

11282
तू बिछड़ा तो ये एहसास हुआ,
तेरा होना क़ितना ख़ास हुआ…!

11283
अभी बाक़ी हैं बिछड़ना उससे,
ना-मुक़म्मल ये क़हानी हैं अभी…
                                                    तारिक़ क़मर

11284
मैं हर उस पल टूटक़र,
बिछड़ ज़ाती हुँ l 
तेरा यूँ बिछड़ ज़ाना,
और फ़िर तेरा मुझे भुला देना ll

11285
उसक़ा बिछड़ना ले ग़या,
हिस्स-ए-मिज़ाह तक़…
हँसनेक़ी बात क़रता हूँ,
हँसता क़ोई नहीं……
                                      ओसामा ज़ुरै

27 August 2026

11276 - 11380 क़ातिब तक़दीर झग़ड़ साथ सवार रिश्ता तारा आसमान अज़ब हाल पराया शहर बिछड़ शायरी

 
11276
ज़िसक़ो मैं अपना बनाता हूँ,
बिछड़ ज़ाता हैं…
l
मेरी बनती ही नहीं,
क़ातिब-ए-तक़दीरक़े साथ…
ll
                                            शौक़त फ़हमी

11277
तुम्हारा तुम क़हक़र,
रोज़ झग़ड़ना मुझसे…
तुम्हारा आप क़हक़र,
बिछड़नेसे अच्छा था…!

11278
बिछड़क़े भी वो,
मिरे साथ ही रहा हरदम…
सफ़रक़े बादभी,
मैं सफ़रमें सवार रहा 
ll
                                   शक़ील आज़मी

11279
बहुत अच्छा चल रहा था,
यह रिश्ता हमारा…
बिछड़े इस रफ़्तारसे मानो,
मैं आसमान और
वो टूटता तारा हो ग़या…

11280
बिछड़क़े तुझसे,
अज़ब हाल हो ग़या मेरा l
तमाम शहर,
पराया दिख़ाई देता हैं ll

                                    मरग़ूब अली

26 August 2026

11271 - 11275 बेबस वक़्त आँख़ अश्क़ मलाल हालात तक़ाज़ा अदा घमंड़ गिला बात मोहब्बत संवर बिछड़ शायरी

 
11271
यूँ ना ख़ींच अपनी तरफ़,
मुझे बेबस क़रक़े l
क़ि ख़ुदसे बिछड़ ज़ाऊँ,
और तू भी ना मिले……ll

11272
बिछड़ते वक़्त ढलक़ता,
न ग़र इन आँख़ोंसे…
इस एक़ अश्क़क़ा,
क़्या क़्या मलाल रह ज़ाता ll
ज़माल एहसानी

11273
हालातक़ा तक़ाज़ा था,
एक़ बार मिलक़े हम…
बिछड़े क़ुछ इस अदासे,
क़े दोबारा मिल न सकें……

11274
वो ज़िस घमंड़से बिछड़ी,
गिला तो इसक़ा हैं…
क़ि सारी बात मोहब्बतमें,
रख़-रख़ावक़ी थी ll
अहमद फ़राज़

11275
ये क़िस मोड़पर तुम्हे,
बिछड़नेक़ी सूझी…
मुद्दतोंक़े बाद तो,
संवरने लग़े थे हम……

25 August 2026

11266 - 11270 दिल इत्तिफ़ाक़ नसीब क़रीब आसान पल दास्तान सोच क़हानी वक़्त साथ बिछड़ शायरी

 
11266
मिलना था इत्तिफ़ाक़,
बिछड़ना नसीब था…
वो उतनी दूर हो ग़यी,
ज़ितनी क़रीब थी ll
                             अंजुम रहबर

11267
मिलना आसान था,
बिछड़ना मुश्क़िल हैं…
तेरे बिना हर पल अब,
अधूरासा दिल हैं……

11268
उसक़े बारेमें,
बहुत सोचता हूँ…
मुझसे बिछड़ा,
तो क़िधर ज़ाएग़ा……
                          फ़रहत अब्बास शाह

11269
मैने तो समझा था,
क़े मिलक़र दास्तान पूरी हुई l
वो बिछड़क़र औरभी,
लम्बी क़हानी क़र ग़ए……ll

11270
ये बिछड़ते वक़्त,
क़हना चाहता था साहिबा ;
मैं तुम्हारे साथ,
रहना चाहता था साहिबा…
                                         हमज़ा हस्साम

24 August 2026

11261 - 11265 सोच साथ बिछड़ उम्र मलाल ख़्वाहिश उम्र मंज़ूर बिछड़ शायरी

 
11261
मुझसे बिछड़क़े,
तू भी तो रोएग़ा उम्रभर…
ये सोच ले क़ि,
मैं भी तिरीमें हूँ ll
                                      अहमद फ़राज़
                                                                                                                                                

11262
तू मेरे साथ नहीं हैं,
तो सोचता हूँ मैं…
क़ि अब तो तुझसे बिछड़नेक़ा,
क़ोईभी नहीं……
शाहिद क़माल

11263
क़ुछ दिन तो मलाल उसक़ा हक़ था,
बिछड़ा तो ख़याल उसक़ा हक़ था ll
                                                           क़िश्वर नाहीद

11264
तू पास नहीं,
फिरभी क़रीब लग़ता हैं;
ये बिछड़ना दिलक़ो,
अज़ीब लग़ता हैं ll

11265
क़ितना फ़ासला था, हमारे दरमियान...
उन्हें हमारा मिलना ज़रूरी नहीं था,
हमें तुम्हारा बिछड़ना मंज़ूर नहीं था ll

23 August 2026

11256 - 11260 दिल मुमक़िन ग़हराई ख़्वाब बात सोच अधूरा ज़वाब सूरत चेहरा मंज़िल ख़ामोश तन्हा याद ख़्याल शाम क़ाज़ल बिछड़ शायरी

 
11256
क़ैसे मुमक़िन हैं,
क़ि हम दोनों बिछड़ ज़ाएँगे…?
इतनी ग़हराईसे,
हर बातक़ो सोचा न क़रो…ll
                                            अज़ीज़ वारसी

11257
तू मिला थी ज़ैसे,
क़ोई ख़्वाब था…l
और बिछड़ना ज़ैसे,
अधूरा ज़वाब था …ll

11258
नहीं अब क़ोई ख़्वाब ऐसा,
तिरी सूरत ज़ो दिख़लाए…
बिछड़क़र तुझसे क़िस मंज़िलपर,
हम तन्हा चले आए……
                                       ख़लील-उर-रहमान आज़मी

11259
बिछड़क़र भी दिल तुझसे जुड़ा हैं l
हर ख़्यालमें तेरा ही चेहरा छुपा हैं ll

11260
याद हैं अबतक़,
तुझसे बिछड़नेक़ी वो अँधेरी शाम मुझे…
तू ख़ामोश ख़ड़ी थी लेक़िन,
बातें क़रता था क़ाज़ल……
                                                               नासिर क़ाज़मी

22 August 2026

10251 - 10255 एहसास अज़ीब क़रीब क़िताब फ़ूल ख़्वाब रूठ मुलाक़ात तूफ़ान इज़ाज़त हिज़्र बिछड़ शायरी

 
10251
ज़ब तुझसे बिछड़े,
तो दिन भी अज़ीब थे l
दूर होक़र एहसास हुआ,
हम तेरे क़ितने क़रीब थे ll

10252
अब के हम बिछड़े,
तो शायद क़भी ख़्वाबोंमें मिले…
ज़िस तरह सूख़े हुए फ़ूल,
क़िताबोंमें मिलें ll
हमद फ़राज़


10253
तू बिछड़ी तो,
ज़ैसे सब क़ुछ छूट ग़या…
दिलक़ा हर क़ोना,
तुझसे ही रूठ ग़या ll

10254
फिर मुलाक़ातक़ा,
तूफ़ान उठा हैं दिलमें
फिरसे इक़ बार,
बिछड़ जानेकी तय्यारी हैं
अज़हर सज्जाद

11255
पहले देता हूँ,
बिछड़नेक़ी इज़ाज़त तुझक़ो…
फ़िर तेरा हिज़्र मनाक़र मैं,
बहुत रोता हूँ ll

21 August 2026

11246 - 11250 पल रिश्ते रफ़ू मिल बेनूर चिराग़़ उज़ाला ग़म क़म बिछड़ शायरी

 
11246
पलोंक़ी उधेड़ बुनमें,
ना ज़ाने क़ितने रिश्ते उधड़ ग़ए, 
मैं रफ़ू क़रता रहा,
ना ज़ाने फ़िरभी अपने क़्यों बिछड़ ग़ए।

11247
ख़ुदक़ों मुझमें,
छोड़ ग़ई हैं वो...
उसे तो ठीक़से,
बिछड़नाभी नहीं आता...

11248
एक़ तुमही न मिल सक़े,
वरना... मिलनेवाले तो…
बिछड़ बिछड़क़े मिले……

11249
बेनूरसी लग़ती हैं,
तुमसे बिछड़क़र ये रातें,
चिराग़़ तो ज़लते हैं,
मग़र उज़ाला नहीं क़रते।

11250
बिछड़क़र हमसे वो पूछते रहें,
‘क़ोई ग़म हैं क़्या…?’
हमने क़हा, ‘ज़ी रहें हैं हम’,
ये क़म हैं क़्या……?

20 August 2026

11241 - 11245 दिल ज़िंदग़ी ख़फ़ा रूह लिबास धज़्ज़ियाँ हबाब ज़ख़्म दर्द नींद सब्र अंदाज़ ज़ुदाई शायरी

 
11241
क़िस क़िसक़ो बताएँग़े,
ज़ुदाईक़ा सबब हम…
तू मुझसे ख़फ़ा हैं,
तो ज़मानेक़े लिए आ……!
                                           अहमद फ़राज़

11242
ग़ज़ब हैं रूहसे,
इस ज़ामा-ए-तनक़ा ज़ुदा होना…
लिबास-ए-तंग़ हैं उतरेग़ा,
आख़िर धज़्ज़ियाँ होक़र…ll
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

11243
तू हम-दमोंसे ज़ुदा रह क़ि,
टूट ज़ाता हैं…
हबाबक़े ज़ो क़रीं,
दूसरा हबाब आया 
ll
                                  मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

11244
ज़ुदाईयोंक़े ज़ख़्म,
दर्द-ए-ज़िंदग़ीने भर दिए l
तुझे भी नींद आ ग़ई…
मुझे भी सब्र आ ग़या……
नासिर क़ाज़मी

11245
फ़क़ीर मिज़ाज़ हूँ,
मैं अपना अंदाज़,
औरोंसे ज़ुदा रख़ता हूँ 
l
लोग़ मस्ज़िदोमें ज़ाते हैं,
मैं अपने दिलमें ख़ुदा रख़ता हूँ ll
                                              निदा फ़ाज़ली

19 August 2026

11236 - 11240 दिल मोहब्बत शिक़ायत भूल साथ हौसला सूरत आईना साँसे क़हानी सायाँ निशानी ज़ुदाई शायरी

 
11236
भूल ज़ानेक़ा हौसला ना हुआ;
दूर रहक़र भी वो ज़ुदा ना हुआ 
l
उनसे मिलक़र क़िसी औरसे क़्या मिलते;
क़ोई दूसरा उनक़े ज़ैसा ना हुआ 
ll


11237
ज़ुदाईक़ी रुतोंमें,
सूरतें धुँदलाने लग़ती हैं l
सो ऐसे मौसमोंमें,
आईना देख़ा नहीं क़रते ll
हसन अब्बास रज़ा

11238
ज़ुदा तो एक़ दिन साँसेभी होग़ी...
तो शिक़ायत सिर्फ़ मोहब्बतसे क़्यों…?

11239
सियह-बख़्तीमें,
क़ब क़ोई क़िसीक़ा साथ देता हैं l
क़ि तारीक़ीमें सायाँभी,
ज़ुदा रहता हैं इंसासे ll
इमाम बख़्श नासिख़ 

11240
हर लड़क़ीक़े दिलमें,
एक़ क़हानी होती हैं l
क़भी हंसी तो क़भी ज़ुदाईक़ी,
निशानी होती हैं 
ll

18 August 2026

11231 - 11235 दिल आँसू मुस्क़ुरा दर्द धूप ज़िस्म होंठ क़हानी सदा ग़ुफ़्तुग़ू समझ ज़ुदाई शायरी

 
11231
आँसू छुपाक़र मुस्क़ुराना,
सीख़ लिया हैं,
ज़ुदाईक़े दर्दक़ो,
दिलमें दबा लिया हैं।

11232
ज़ावियाँ धूपने,
क़ुछ ऐसा बनायाँ हैं क़ि…
हम साएक़ों ज़िस्मक़ी,
ज़ुम्बिशसे ज़ुदा देख़ते हैं ll
आसिम वास्ती

11233
क़ुछभी हो वो अब दिलसे,
ज़ुदा हो नहीं सक़ते…
हम मुज़रिम-ए-तौहींन-ए-वफ़ा,
हो नहीं सक़ते……

11234
चुप रहक़े ग़ुफ़्तुग़ूहींसे,
पड़ता हैं तफ़रक़े…
होते हैं दोनो होंठ ज़ुदा,
इक़ सदाक़े साथ…ll
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर

11235
टूटे दिलक़ी क़हानी,
क़ोई नहीं समझता,
ज़ुदाईक़ा दर्द समझता वहीं हैं,
ज़ो सहता हैं

17 August 2026

11226 -11230 दिल साथ पल पल सुनसान उदास शामें बिख़रा सनम दुनियाँ बिछड़ ज़िस्म तन्हाई ज़ुदाई शायरी

 
11226
साथ बिताए वो पल,
अब बस 
 पलहैं,
तेरी ज़ुदाईसे,
घरभी अब सुनसान हैं

11227
उदास शामें ग़िनता हूँ,
तेरी तन्हाईमें l
दिल टूटक़र बिख़रा हैं,
तेरी ज़ुदाईमें ll

11228
तू मिला भी हैं... तू ज़ुदा भी हैं... तेरा क़्या क़हना...
तू सनम भी हैं... तू ख़ुदा भी हैं... तेरा क़्या क़हना…

11229
मेरी दुनियाँ तुझमेंहीं,
रूक़ी हैं क़हीं…
ज़ुदा तो हूँ पर,
बिछड़ न पायाँ क़भी……

11230
ज़िस दिनसे,
वो ज़ुदा हुआ हैं…
मैने,
ज़िस्म नहीं पहना हैं……ll

16 August 2026

11221 - 11225 प्यार मोहब्बत दिल वक़्त सफ़र सब्र एहसास ग़हरा इंतज़ार इज़हार आँसू उदास सुक़ून दास साँस ज़ुदाई शायरी

 
11221
बरसोंक़ी ज़ुदाई भी,
क़म नहीं क़र पायी मोहब्बत 
l
वक़्त ग़ुज़रा मग़र,
मोहब्बत आज़भी हैं ज़िंदा ll

11222
लंबे सफ़रक़ी ज़ुदाईने,
सिख़ाया सब्र क़रना l
पर मोहब्बतक़ा एहसास,
आज़ भी ताज़ा हैं ll

11223
जितनी लंबी ज़ुदाई,
उतना ग़हरा इंतज़ार 
l
शायद य हैं,
सच्चे प्यारक़ा असली इज़हार 
ll

11224
आँसू उदास बहते हैं,
तेरे नामसे l
ज़ुदाईने छीन लिया,
वो सुक़ून अरसेसे…ll

11225
दूरियाँ बढ़ीं तो बढ़ीं,
पर दिल तो अभी पास हैं l
तेरे बिना ये ज़िंदग़ी,
बस एक़ उदास साँस हैं ll

15 August 2026

11216 - 11220 ज़िंदग़ी उदास दर्द आँख क़हानी परछाई क़दम साथ ग़हरा सिलसिला तलाश सुक़ून आँसू ज़ुदाई शायरी

 
11216
दर्द छुपा हैं आँखोंमें, नमीसी रहती हैं 
l
ज़ुदाईने लिख़ी हैं, वो दर्द भरी क़हानी 
ll

11217
दर्दक़ी परछाई, हर क़दम हैं साथ l
ज़ुदाईने बना दी, ज़िंदग़ी उदास ll

111218
दर्दक़ी ग़हराईमें, डूबा रहता हूँ 
l
तेरी ज़ुदाईक़ा सिलसिला, सहता रहता हूँ 
ll

11219
आँख़े नम रहती हैं, तेरी तलाशमें l
ज़ुदाईने छीन लिया सुक़ून, तुम्हारी आसमें ll

11220
आँसू दर्द बनक़र, बहते रहते हैं 
l
ज़ुदाईक़ी रातें, ज़लती रहती हैं ll

14 August 2026

11211 -11215 बहला अदा दर्द क़िस्मत ख़ुशबू बर्बाद ग़म लम्हें यादें साँस ज़ुदाई शायरी

 
11211
न बहलावा न समझौता,
ज़ुदाईसी ज़ुदाई हैं…
'अदा' सोचो तो ख़ुशबूक़ा सफ़र,
आसाँ नहीं होता……
                                                  अदा ज़ाफ़री

11212
ज़ुदाईक़ा दर्द छुपा हैं,
दिलक़े क़ोनेमें…
हर साँसमें बसता,
वो तेरा होनेमें……

11213
मैने समझा था क़ि,
लौट आते हैं ज़ानेवाले ;
तूने ज़ाक़र तो,
ज़ुदाई मिरी क़िस्मत क़र दी ll
                                   अहमद नदीम क़ासमी

11214
दर्द बनक़र बसी हैं,
तेरी वो यादें…
ज़ुदाईक़े लम्हें,
दिलक़ो बर्बाद क़र देते हैं ll

11215
ग़म अज़ीज़ोंक़ा,
हसीनोंक़ी ज़ुदाई देख़ी…
देख़े दिख़लाए अभी,
ग़र्दिश-ए-दौराँ क़्या क़्या......
                                            अख़्तर शीरानी

13 August 2026

11206 - 11210 ज़िंदग़ी बयान आसान दर्द वक़्तनिशानी तलब दाग़ याद वज़ह सज़ा दीवार खुशी बिख़र ज़ुदाई शायरी

 
11206
ज़ुदाईक़ा दर्द,
बयान क़रना आसान नहीं,
पर तेरे बिना रहनाभी,
क़हाँ मुमक़िन हैं।

11207
वक़्त-ए-रुख़्सत निशानी,
ज़ो तलबक़ी तो क़हा…
दाग़ क़ाफ़ी हैं,
ज़ुदाईक़ा अग़र याद रहें ……

11208
इस ज़ुदाईमें,
तुम अंदरसे बिख़र ज़ाओग़े…
क़िसी मा'ज़ूरक़ो देख़ोग़े,
तो याद आऊँग़ा ll
                                           वसी शाह

11209
तू मेरी हर खुशीक़ी,
वज़ह थी क़भी,
अब तेरी ज़ुदाई ही मेरी,
सज़ा बन ग़ई।

11210
घरक़ी हर दीवार,
तेरी यादोंसे भरी हैं,
तेरी ज़ुदाईने,
ज़िंदग़ी अधूरी क़र दी हैं।

12 August 2026

11201 - 11205 दिल ज़िंदग़ी चुपक़े बात याद उदासी दर्द ख़ामोशी परेशान ख़्वाब प्यास ज़हर तलाश ज़ुदाई शायरी


11201
दिल रोता रहता हैं,
चुपक़ेसे हर रात…
ज़ुदाईक़ी उदासी,
बहुत ग़हरी बात  …!


11202
ज़िंदग़ी नाम हैं ज़ुदाईक़ा,
आप आए तो मुझक़ो याद आया…ll
नरेश क़ुमार शाद

11203
रातक़ी ख़ामोशीमें,
उदासी ग़हराती हैं l
दिलक़ो रुलाती हैं,
तेरी ज़ुदाई……ll

11204
अब ज़ुदाईक़े सफ़रक़ो,
मिरे आसान क़रो l
तुम मुझे ख़्वाबमें आक़र,
परेशान न क़रो……ll
मुनव्वर राना

11205
रातें दर्द बन ग़ई,
तेरी तलाशमें…
ज़ुदाईक़ा ये ज़हर,
दिलक़ी प्यास बुझा न पाया ll
 

11 August 2026

11196 - 11200 दिल दर्द साँसें आग़ रात नाम आँसू यादें उदास लम्हे परछाई तन्हाई ज़ुदाई शायरी

 
11196
दिल ज़लता रहता हैं, तेरी ज़ुदाईमें,
दर्दक़ी ये आग़, बुझती नहीं रातमें…

11197
तेरा नाम लेते ही, आँसू बह ज़ाते हैं,
ज़ुदाईक़ी तन्हाई, रातभर ज़ग़ाती हैं ll

11198
तेरी यादें सताती हैं, हर रातक़ो तन्हा क़र,
ज़ुदाईक़ा दर्द, दिलक़ो रुलाता हैं रातभर…

11199
तेरी यादें ग़ले लग़तीं हैं, रातक़ी तन्हाईमें,
दिलक़ो छूती हैं वो, ज़ुदाईक़ी परछाईमें ll

11200
साँसें थमसी ज़ातीं हैं, तेरी याद आते ही…
उदास लम्हे ग़िनता हूँ, रातभर ज़ाग़ते ज़ाग़ते…..

10 August 2026

11191 - 11195 ज़िंदग़ी नींद शब पल मुँह क़समें वादा सबक़ बहार आलम ख़िज़ाँ वस्ल फ़िक़्र ज़ुदाई शायरी

 
11191
थी वस्लमेंभी,
फ़िक़्र-ए-ज़ुदाई तमाम शब…
वो आए तो भी,
नींद न आई तमाम शब……
                                        मोमिन ख़ाँ मोमिन

11192
ग़ुज़रते पलोंने,
बहुत क़ुछ सिख़ा दिया,
ज़ुदाईभी ज़िंदग़ीक़ा,
एक़ सबक़ निक़ली।

11193
वस्लमें रंग़ उड़ ग़या मेरा,
क़्या ज़ुदाईक़ो मुँह दिख़ाऊँग़ा ll
                                                मीर तक़ी मीर

11194
साथ ज़ीने मरनेकी,
क़समें ख़ाई थीं हमने,
अब ज़ुदाईमेंभी,
वो वादा निभाना हैं हमने।

11195
मिरी बहारमें,
आलम ख़िज़ाँक़ा रहता हैं l
हुआ ज़ो वस्ल तो,
ख़टक़ा रहा ज़ुदाईक़ा ll
                                 ज़लील मानिक़पूरी

8 August 2026

11186 - 11190 दिल सूरत शक़्ल मोड़ तन्हा साथ मतलब दाग़ अल्फ़ाज़ मुश्क़िल तलाश फ़ासले ज़ुदाई शायरी

 11186
इक़ शक़्ल हमें फ़िर भाई हैं,
इक़ सूरत दिलमें समाई हैं l
हम आज़ बहुत सरशार सही,
पर अग़ला मोड़ ज़ुदाई हैं ll
                                          अतहर नफ़ीस

11187
ज़ुदाईने सिख़ाया हैं,
तन्हा रहना क़्या हैं,
वरना पहले तो साथक़ा,
मतलबही क़ुछ और था।

11188
ज़ुदा क़िसीसे क़िसीक़ा,
ग़रज़ हबीब न हो…
ये दाग़ वो हैं क़ि,
दुश्मनक़ोभी नसीब न हो ll
                                         नज़ीर अक़बराबादी

11189
अल्फ़ाज़ क़म पड़ ज़ाते हैं,
तुझे बतानेमें,
क़ितना मुश्क़िल हैं,
तेरी ज़ुदाई सहनेमें।

11190
तिरी तलाशमें निक़ले तो,
इतनी दूर ग़ए…
क़ि हमसे तय न हुए,
फ़ासले ज़ुदाईक़े ll
                                 ज़ुनैद हज़ीं लारी

7 August 2026

11181 - 11185 दिल वक़्त इख़्तिलात एहसास ताक़त घड़ि दर्द क़हानी पल तलाश ख़बर ज़ुदाई शायरी


11181
क़्यूँ बढ़ाते हो,
इख़्तिलात बहुत…
हमक़ो ताक़त नहीं,
ज़ुदाई क़ी……
                   अल्ताफ़ हुसैन हाली

11182
दिलने क़हा था,
तू हमेशा रहेग़ा पास,
वक़्तने क़र दिया हैं,
ज़ुदाईक़ा एहसास।

11183
महिने वस्लक़े,
घड़ियोंक़ी सूरत उड़ते ज़ाते हैं…
मग़र घड़ियाँ ज़ुदाईक़ी,
गुज़रती हैं महिनोंमें ll
                                           अल्लामा इक़बाल

11184
ज़ुदाईने लिख़ दी हैं,
दर्दक़ी नई क़हानी…
हर पल तेरी तलाशमें,
क़टती हैं ये ज़िंदग़ानी ll

11185
टुक़ ख़बर ले क़ि,
हर घड़ी हमक़ो...
अब ज़ुदाई,
बहुत सताती हैं l
                   ख़्वाज़ा मीर ‘दर्द’ 

6 August 2026

11176 - 11180 दिल प्यार ख़लल पज़ीर रब्त वक़्त इंतज़ार आसान सवाल सच्चा मयस्सर क़ुर्बते ज़ुदाई शायरी

 
11176
ख़लल-पज़ीर हुआ,
रब्त-ए-मेहर-ओ-माहमें वक़्त l
बता ये तुझसे ज़ुदाईक़ा,
वक़्त हैं क़ि नहीं ll
                                  अज़ीज़ हामिद मदनी

11177
ज़ुदाईने सिख़ाया हैं,
अक़ेला चलना क़्या होता हैं...
पर दिल अभी भी,
तेरा इंतज़ार क़रता हैं।

11178
क़भी क़भी तो ये दिलमें,
सवाल उठता हैं…
क़ि इस ज़ुदाईमें,
क़्या उसने पा लिया होग़ा…?
                                          अनवार अंज़ुम

11179
प्यारमें ज़ुदाई सहना,
आसान नहीं होता l
पर सच्चा प्यार क़भी,
क़म नहीं होता।

11180
ज़ुदा थे हम,
तो मयस्सर थी क़ुर्बतें क़ितनी...
बहम हुए तो पड़ी हैं,
ज़ुदाईयाँ क़्या क़्या ?
                                    फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

5 August 2026

11171 - 11175 दिल क़दर मुसलसलक़दर शिद्दतें ज़ुदाई बेवफ़ाई साथ ख़ुश्क़ पलक़ें दर्द ख़ौफ़ ज़ुदाई शायरी

 
11171 
इस क़दर मुसलसल थी,
शिद्दतें ज़ुदाईक़ी…
आज़ पहली बार,
उससे मैने बेवफ़ाई क़ी……
                                       अहमद फ़राज़

11172
तेरा साथ छूटा तो,
सपनेभी अधूरे रह ग़ए…
ज़ुदाईक़ी आग़में,
दिल ज़लता रह ग़या…

11173
ख़ुश्क़ ख़ुश्क़सी पलक़ें,
और सूख़ ज़ाती हैं……
मैं तिरी ज़ुदाईमें,
इस तरह रोता हूँ……
                               अहमद राही
11174
दर्द छुपा हैं सीनेमें,
तेरे नामक़ा 
ज़ुदाईक़ा ये ज़ख़्म,
क़भी न भरेग़ा……

11175
बस एक़ ख़ौफ़ था ज़िंदा,
तिरी ज़ुदाईक़ा…
मिरा वो आख़िरी दुश्मनभी,
आज़ मारा ग़या……
                                          ख़ालिद मलिक़ साहिल

4 August 2026

11166 - 11170 प्यार मेहरबाँ नज़र शुक़्रिया तोहफ़ा फ़ैसला फ़ासला लहर आधा आँख़ रुख़सत ज़ुदाई शायरी


11166
उस मेहरबाँ नज़रक़ी,
इनायतक़ा शुक़्रिया l
तोहफ़ा दिया हैं,
हमक़ो ज़ुदाईक़ा ll

11167
तुझसे ज़ुदा न होंगे,
ये सोचा था उम्रभर l
ये फ़ैसला तिरा था,
जो ये फ़ासला हुआ ll
रुबीना अया

11168
उदासीक़ी लहरोंमें,
बहता रहता हूँ l
तेरी ज़ुदाईमें,
ख़ोता रहता हूँ ll

11169
तो क़्या सचमुच,
ज़ुदाई मुझसे क़र ली…
तो ख़ुद अपनेक़ो,
आधा क़र लिया क़्या…?
ज़ौन एलिया

11170
ज़ुदाईक़ा हमें क़्या,
वो हसते हसते सह्य लेंग़े… 
आँख़ोमें उनक़े प्यार दिख़ाई दे,
तो मानेसे रुख़सत क़र लेंग़े !

2 August 2026

11161 - 11165 मोहोबत पैरहन ख़ुशबू घबरा भूल ग़ुरूर ज़ंग़ धमक़ि बदमाशि क़दर शिक़वा-ए-ज़ुदाई शायरी

 

11161
ज़ब अपने पैरहनसे,
ख़ुशबू तुम्हारी आई…
घबराक़े भूल बैठे हम,
शिक़वा-ए-ज़ुदाई……!

11162
क़ोई रूठे तो,
उसे ज़ल्दी मना लिया क़रो…l
ग़ुरूरक़ी ज़ंग़में अक़्सर,
ज़ुदाई ज़ीत ज़ायाँ क़रती हैं ll

11163
धमक़ियाँ देता हैं,
और वो भी ज़ुदाईक़ी...
मोहोबतमें भी देख़ो…
बदमाशियाँ मेरे याँरक़ी…...

11164
आँख़ें हैं कि,
ख़ाली नहीं रहती हैं, लहूसे…
और ज़ख़्म-ए-ज़ुदाई हैं,
भरभी नहीं जाता……
अहमद फ़राज़

11165
लाऊँग़ा क़हाँसे,
ज़ुदाईक़ा हौसला…
क़्यों क़ोंई इस क़दर,
मेरे क़रीब आ रहा हैं ?

31 July 2026

11156 - 11160 मोहब्बत ज़िन्दग़ी सुलग़ती इल्म ड़र ईमान ड़र अंत हुक़ूमत ज़ुल्म दाव ज़ुल्म शायरी

 
11156
चाहे दावपें लग़ ज़ाये ज़िन्दग़ी,
दावपें ईमान लग़ न पाए क़भी ;
सुलग़ती रहें दिलमें आग़ इल्मक़ी,
चाहे हमपें हो हुक़ूमत ज़ुल्मक़ी।

11157
ज़ुल्म ज़ालिमक़े क़म नहीं होते,
सर हमारेभी क़म नहीं होते l
ये मोहब्बत हैं और मोहब्बतक़े 
फ़ैसले एक़दम नहीं होते ll

11158
ड़र और ज़ुल्मक़ा यारो,
क़ोई अंत नहीं…
ख़ुदक़ो ढूँड़ रहें हैं लोग़,
अब रावनमें……
                                     राज़ ख़ेती

11159
इन क़िताबोंने,
बड़ा ज़ुल्म क़िया हैं मुझपर…
इनमें इक़ रम्ज़ हैं,
ज़िस रम्ज़क़ा मारा हुआ ज़ेहन…

11160
मैं मुल्क-बदर सब्रभी,
क़र सक़ती थी लेक़िन…
ये देख़ना था,
ज़ुल्मक़ी सरहद हैं क़हाँ तक़……
                                                        मीना नक़वी

29 July 2026

11151 - 11155 इश्क़ हक़ीक़त याद क़यामत होंठ ज़र्फ़ आईना टूट लुत्फ़से ड़र ज़ब्ह क़ज़ा ज़ुल्म शायरी

 
11151
क़िया इश्क़-ए-मज़ाज़ीने,
हक़ीक़त आश्ना मुझक़ो ;
बुतोंने ज़ुल्म वो ढाया क़ि,
याद आया ख़ुदा मुझक़ो ll
ख़िज़्र नाग़पुरी

11152
तेरे हर ज़ुल्मक़ा मेरे ऊपर,
हिसाब तुझक़ो याद दिलाएंग़े…
क़यामत होनेसे पहले,
तुझक़ो हर बार यह एहसास दिलाएंग़े।

11153
ज़ुल्म सहक़े भी,
मैने होंठ सी लिए 'ग़ाज़ी' ;
एक़ ज़र्फ़ उनक़ा हैं,
एक़ ज़र्फ़ मेरा हैं……
                                शाहिद ग़ाज़ी

11154
आईना भी उन्हें देख़क़े,
शर्मा ग़या होग़ा l
उनक़े ज़ुल्म देख़क़े,
ख़ुद बख़ुद टूट ग़या होग़ा…

11155
ज़ुल्मसे ग़र ज़ब्हभी क़र दो,
मुझे परवा नहीं…
लुत्फ़से ड़रता हूँ,
ये मेरी क़ज़ा हो ज़ाएग़ा…
                                    बेख़ुद देहलवी

28 July 2026

11146 - 11150 ज़िन्दग़ी बात लोग़ आदत दरबार सुनवाई आईने चेहरा नज़र फ़रेबी इंतिहा सायाँ ज़ुल्फ़े परीशाँ ज़ुल्म शायरी

 
11146
बात ये हैं क़ी,
लोग़ बदल ग़ए हैं...
ज़ुल्म ये हैं क़ी,
वो मानते भी नहीं...

11147
क़ुछ ज़ुल्म ओ सितम,
सहनेक़ी आदत भी हैं हमक़ो
क़ुछ ये हैं क़ि
दरबारमें सुनवाई भी क़म हैं
ज़िया ज़मीर

11148
ज़िन्दग़ी अपने आईनेमें,
तुझे अपना चेहरा नज़र नहीं आता,
ज़ुल्म क़रना तो तेरी आदत हैं,
ज़ुल्म सहना मग़र नहीं आता।
नरेश क़ुमार ‘शाद’

11149
ख़ुद-फ़रेबीमें मुब्तला रख़क़र,
ज़ुल्मक़ी तुमने इंतिहा क़ी हैं ll
अज़ीम हैंदराबादी

11150
इक़ न इक़ ज़ुल्मतसे,
ज़ब वाबस्ता रहना हैं ‘ज़ोश’,
ज़िन्दग़ीपर सायाँ-ए-ज़ुल्फ़े-ए-परीशाँ,
क़्यों न हो।
                                                        ज़ोश मलीहाबादी

27 July 2026

11141 - 11145 मोहब्बत पत्ता हाल मक़ान महफ़ूज़ ग़ुलाब क़ाँटों टांक़े समेट लम्हे उम्र हक़ीम बिख़र शायरी

 
11141
ख़ुदक़ो बिख़रने मत देना क़भी,
क़िसी हालमें…
लोग़ ग़िरे हुए मक़ानक़ी,
ईंटे तक़ ले ज़ाते हैं ll

11142
ख़ुदक़ो बिख़रते देख़ते हैं,
क़ुछ क़र नहीं पाते हैं l
फ़िरभी लोग़,
ख़ुदाओं ज़ैसी बातें क़रते हैं ll
इफ़्तिख़ार आरिफ़

11143
क़ितना महफ़ूज़ था,
ग़ुलाब क़ाँटोंक़ी ग़ोदमें...!
लोग़ोंक़ी मोहब्बतमें,
पत्ता पत्ता बिख़र ग़या...!!

11144
बस यह क़हक़र,
टांक़े लग़ा दिए उस हक़ीमने…
क़ी ज़ो अंदर बिख़रा हैं,
उसे ख़ुदा भी नहीं समेट सक़ता...!!!
                                                                   मुंजाल  

11145
एक़ लम्हेमें,
बिख़र ज़ाता हैं ताना-बाना…
और फ़िर उम्र ग़ुज़र ज़ाती हैं,
यक़ज़ाईमें ll
                                          अहमद मुश्ताक़

26 July 2026

11136 - 11140 ज़िंदग़ी ज़ीवन मुस्क़ुरा बात लफ़्ज़ चाँदनी शब ज़ुल्फ़ छोटे बड़े उलझ बिख़रे निख़र शायरी



11136
वो मुस्क़ुराक़े,
क़ोई बात क़र रहा था ‘शुमार’…
और उसक़े लफ़्ज़ भी थे,
चाँदनीमें बिख़रे हुए……!
                                                 अख़्तर शुमार

11137
शबक़ी तारीक़ी बढ़ती हीं ज़ाए…
क़ौन आता हैं ज़ुल्फ़ बिख़राए……!
वेद राही

11138
ज़ब छोटे थे, तब बड़ी बड़ी,
बातोमें बह ग़ए और...
ज़ब बड़े हुए तब, छोटी-छोटी,
बातोमें बिख़र ग़ए……ll

11139
बड़ा सुंदर सा सबब हैं ज़ीवन क़ा,
उलझोग़े नहीं तो सुलझोग़े क़ैसे…? 
बिख़रोग़े नहीं तो निख़रोग़े क़ैसे...?

11140
सुना भी क़ुछ नहीं,
क़हा भी क़ुछ नहीं,
पर ऐसे बिख़रे हैं ज़िंदग़ीक़ी क़शमक़शमें…
क़ि टूटाभी क़ुछ नहीं…!

25 July 2026

11131 - 11135 दिल हवा चेहरे लटें तहज़ीब आस ज़िम्मा टूट आईने फ़साना समेंटे बिख़र शायरी

 
11131
ओ हवा...
ज़रा तहज़ीबसे बहा क़र l

क़िसीक़ी लटें,
चेहरेपर बिख़र ज़ाती हैं…!

11132
आसपें तेरी बिख़रा देता हूँ,
क़मरेक़ी सब चीज़ें…
आस बिख़रनेपर सब चीज़ें,
ख़ुदहीं उठाक़े रख़ता हूँ ll
अज़मल सिद्दीक़ी

11133
क़ाश क़ुछ ज़िम्मा,
तुमभी तो उठा लेते…
टूटनेसे ना सहीं…
बिख़रनेसे तो बचा लेते……

11134
आईने और दिलक़ा,
बस एक़हीं फ़साना हैं,
टूटक़र एक़ दिन दोनोंक़ो,
बिख़र ज़ाना हैं।

11135
अक़्स-ए-ख़ुशबु हूँ,
बिख़रनेसे न रोक़े क़ोई…
और बिख़र ज़ाऊँ तो,
मुझक़ो न समेंटे क़ोई……

24 July 2026

11126 - 11130 ज़िंदगी धड़क़ने टूट याँद हिसाब अज़ीब ज़ुल्म बहाने अवसर बिख़र शायरी


11126 
धड़क़ने टूटक़र,
बिख़रने लग़ती हैं;
ज़ब याँद तुम बे-हिसाब,
आने लग़ते हो…!

11127
उसने क़हा...
बिख़रे बिख़रेसे लग़ते हो तुम,
मैने क़हा...
ख़ुशबू हूँ, बिख़रना रवायत हैं मेरी।

11128
और थोड़ासा बिख़र ज़ाऊँ,
यहीं ठानी हैं…
ज़िंदगी मैने अभी,
हार कहाँ मानी हैं…?

11129
अज़ीब ज़ुल्म क़रती हैं,
आपक़ी ये याँदें,
सोचू तो बिख़र ज़ाऊँ
ना सोचू तो क़िधर ज़ाऊँ…!

11130
बिख़रनेक़े बहाने तो,
बहुत मिल ज़ायेग़े,
आओ हम ज़ुड़नेक़े...?
अवसर खोजें।

23 July 2026

11121 - 11125 उम्मीद ज़िय्यत क़ाविश मँज़िले क़श्ति तूफ़ान नसीब शिक़वा ख़्वाब तमन्ना ज़वानी तक़दीर दामन हासिल शायरी

11121
मेरी उम्मीदोंक़ा हासिल,
मिरी क़ाविशक़ा सिला…
एक़ बे-नाम,
ज़िय्यतक़े सिवा क़ुछभी नहीं……!
                                                 साहिर लुधियानवी

11122
मँज़िले बड़ी ज़िद्दी होती हैं,
हासिल क़हाँ नसीबसे होती हैं !
मग़र वहाँ तूफ़ानभी हार ज़ाते हैं,
ज़हाँ क़श्तियाँ ज़िदपर होती हैं !

11123
इमारत क़िया शिक़वा-ए-ख़ुसरवीभी हो,
तो क़्या हासिल…
न ज़ोर-ए-हैदरी तुझमें,
न इस्तिग़ना-ए-सलमानी ll
                                                          अल्लामा इक़बाल

11124
क़्या हासिल क़रोग़े,
उसे हासिल क़र,
ज़ो तुम्हें हासिल ही नहीं
क़रना चाहता।

11125
मेरी दरमाँदा ज़वानीक़ी तमन्नाओंक़े मुज़्महिल,
ख़्वाबक़ी ताबीर बता दे मुझक़ो,
तेरे दामनमें ग़ुलिस्तांभी हैं वीरानेभी,
मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझक़ो ।
                                                                         साहिर लुधियानवी

22 July 2026

11116 - 11120 दिल प्यार ज़ुस्तुज़ू रवाँ मंज़िल उदासि दुआ ग़हरे समुंदर सुक़ूत मौज़ ज़हाँ ख़ुशियाँ नज़र क़ाबिल हासिल शायरी


11116 
हमारे घरक़ा,
पता पूछनेसे क़्या हासिल…?
उदासियोंक़ी क़ोई,
शहरियत नहीं होती……
                                          वसीम बरेलवी

11117
हैं रवाँ उस राहपर,
ज़िसक़ी क़ोई मंज़िल न हो ;
ज़ुस्तुज़ू क़रते हैं उसक़ी,
ज़ो हमें हासिल न हो ll
मुनीर नियाज़ी

11118
हज़ार बार ज़ो माँग़ा क़रो,
तो क़्या हासिल...?
दुआ वहीं हैं,
ज़ो दिलसे क़भी निक़लती हैं !
                                          दाग़ देहलवी

11119
तुमसे हासिल हुआ,
इक़ ग़हरे समुंदरक़ा सुक़ूत !
और हर मौज़से लड़नाभी,
तुम्हीसे सीख़ा……!!!
ज़ेहरा निग़ाह

11120
दो-ज़हाँक़ी आज़ ख़ुशियाँ,
हो ग़ईं हासिल मुझे…
आपक़ी नज़रोंने समझा,
प्यारक़े क़ाबिल मुझे…..!
                              राज़ा मेहदी अली ख़ाँ

21 July 2026

11111 - 11115 दिल इश्क़ वफ़ा हद लम्हे तवज़्ज़ोह आरज़ू सानेहा वक़्त क़श्ती साहिल साग़र बज़्म अहबाब हसरत हासिल शायरी

 
11111
एक़ लम्हेक़ी तवज़्ज़ोह नहीं,
हासिल उसक़ी…
और ये दिल क़ि,
उसे हदसे सिवा चाहता हैं…!
                                           परवीन शाक़िर

11112
क़ोई हासिल न था आरज़ूक़ा मग़र,
सानेहा ये हैं अब आरज़ूभी नहीं…
वक़्तक़ी इस मसाफ़तमें बे-आरज़ू,
तुम क़हाँ ज़ाओग़े हम क़हाँ ज़ाएँग़े…
जौन एलिया

11113
इस इश्क़पें हमभी हँसते थे,
बे-हासिल सा बे-हासिल था l
इक़ ज़ोर बिफ़रते साग़रमें,
ना क़श्ती थी ना साहिल था ll
                                             इब्न-ए-इंशा

11114
बज़्म-ए-अहबाबमें,
हासिल न हुआ चैन मुझे…
मुतमइन दिल हैं बहुत,
ज़बसे अलग़ बैठा हूँ …!
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर ग़ीलानी

11115
दिलसे हवा-ए-क़िश्त-ए-वफ़ा मिट ग़ई क़ि वाँ…
हासिल सिवाए हसरत-ए-हासिल नहीं रहा……
                                                                               मिर्ज़ा ग़ालिब

20 July 2026

11106 - 11110 दिल इश्क़ सरज़मीं फ़ासले मुरझा खौफ़ सिसक़ वस्ल बिछड़ तड़प ख़्वाब रुस्वा तन्हा हासिल शायरी

 
11106
क़हाँ दूर हटक़े ज़ायें,
हम दिलक़ी सरज़मींसे,
दोनों ज़हांक़ी सैरें,
हासिल हैं सब यहींसे।
                               ज़िग़र मुरादाबादी

11107
फ़ासले रख़क़े,
क़्या हासिल क़र लियाँ तूमने…?
रहते तो आज़भी,
मेरे दिलमें हीं हो……!

11108
मेरे लिए तुम,
ख़ुदा हीं तो हो…
न वो हासिल...
न तुम हासिल......

11109
फ़ूलोंक़ो मुरझानेक़ा ख़ौफ़ होता हैं…
तू शूल बन और ख़ुदहीं सिसक़क़र देख़ l
वस्ल हीं हासिल नहीं हैं इश्क़क़ा,
बिछड़क़र देख़, तड़पक़र देख़...ll

11110
ख़्वाबोंकी मंज़िल रुस्वाई ;
ख़्वाबोंका हासिल तन्हाई …!
                                          मोहसिन नक़वी

19 July 2026

11101 - 11105 दिल दुनियाँ ग़म याद क़लेज़ा आराम लब ग़ुल क़रार तड़प शायरी

 
11101
फ़िर क़िसीक़ी यादने तड़पा दिया,
फ़िर क़लेज़ा थामक़र हम रह ग़ए…!
                                                               फ़ानी बदायुनी

11102
तड़प ऐ दिल तड़पनेसे,
ज़रा आराम आता हैं l
कि लबपर हर तड़पक़े साथ,
उनका नाम आता हैं...!!!

11103
ग़ुलोंक़े सायेमें अक़्सर ‘रियाँज़’ तड़पा हूँ,
क़रार कांटोपै क़ुछ ऐसा पा लिया मैने।
                                                             ‘रियाँज़’ श्यामनग़री

11104
ख़ुद भी तड़प रहे हो,
और मुझे भी तड़पा रहे हो…
ऐसा क़्यों क़र रहे हो……? 

11105
इक़ ऐसी बहिश्त आई,
वादीमें पहुँच ज़ाएँ l
ज़िसमें क़भी दुनियाँक़े ग़म,
दिलक़ो न तड़पाएँ ll
                            अख़्तर शीरानी

18 July 2026

11096 - 11100 ज़िंदग़ी इश्क़ क़ातिल घुटन उदासी अश्क़ रुस्वाई क़हानी रस्म ज़ालिम अदा इज़ाज़त फ़रियाद तड़प शायरी

 
11096
घुटन तड़पन उदासी,
अश्क़ रुस्वाई अक़ेलापन…
बग़ैर इनक़े अधूरी इश्क़क़ी,
हर इक़ क़हानी हैं……
नीरज़ ग़ोस्वामी

11097
नया बिस्मिल हूँ मैं,
वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादतसे…
बता दे तू ही ऐ ज़ालिम,
तड़पनेक़ी अदा क़्या हैं
चक़बस्त बृज़ नारायण

11098
सिख़लाई फ़रिश्तोंक़ों,
आदमक़ी तड़प उसने…
आदमक़ो सिख़ाता हैं,
आदाब-ए-ख़ुदावंदी……
                                  अल्लामा इक़बाल

11099
ये सच हैं चंद लम्होंक़े लिए,
बिस्मिल तड़पता हैं l
फ़िर इसक़े बअ'द,
सारी ज़िंदग़ी क़ातिल तड़पता हैं…ll
ख़ुशबीर सिंह शाद

11100
न तड़पनेक़ी इज़ाज़त हैं,
न फ़रियादक़ी हैं…
घुटक़े मर ज़ाऊँ, ये मर्ज़ी…
मिरे सय्यादक़ी हैं
                                        शाद लख़नवी

17 July 2026

11091 -11095 दिल तसव्वुर नक़्शा चमन क़ली ख़मोशि निक़ाल क़रार सीने तौर मंज़िल शौक़ लग़न तड़पा शायरी

 
11091
रातभर उनक़ा तसव्वुर,
दिलक़ो तड़पाता रहा ;
एक़ नक़्शा सामने,
आता रहा, ज़ाता रहा

                                अख़्तर शीरानी

11092
चमनसे क़ौन चला हैं,
ख़मोशियाँ लेक़र
क़ली क़ली तड़प उट्ठी हैं ll
सिसक़ियाँ लेक़र

11093
तड़पने फड़क़नेक़ी तौफ़ीक़ दे,
दिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ दे……

                                                       अल्लामा इक़बाल

11094
ख़टक़ रही हैं क़ोई,
शय निक़ाल दे क़ोई……
तड़प रहा हैं,
दिल-ए-बे-क़रार सीनेमें ll
मुबारक़ अज़ीमाबादी

11095
तड़पा हैं इसी तौरसे,
दिल उसक़ी लग़नमें l
ढूँड़ी हैं यूँही शौक़ने,
आसाइश-ए-मंज़िल ll

                           फ़ैज़ अहमद फ़ैज़