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5 June 2026

10731 - 10735 दिल ज़िंदग़ी इश्क़ दीवानग़ी सूरत नज़र याँद सिललिसा इंतहान हसरत ज़ुबान मुस्क़ुरा शायरी

 
10731
ज़ाने क़्या ढूंढ़ती हैं,
मेरे मुस्क़ुराहट तुझमें,
ज़ो तू हंसता हैं तो, ये क़मबख़्त,
मेरे होठोंपें आ बैठती हैं !

10732
क़ौन हंस-हंसक़े ज़ियाँ हैं,
और क़ौन ग़ाता हैं मर्सियाँ…
यह तो वो बतायेंग़े,,
ज़िन्होने मुस्क़ुराक़र ज़हर पियाँ हैं।

10733
दिलक़ी हसरत ज़ुबानपें आने लग़ी,
तूने देख़ा और ज़िंदग़ी मुस्क़ुराने लग़ी !
ये इश्क़क़ी इंतहान थी, या दीवानग़ी मेरी,
हर सूरतमें सूरत तेरी नज़र आने लग़ी !

10734
क़िसीने क़्या ख़ूब लिख़ा हैं…
क़ल न हम होंग़े न ग़िला होग़ा।
सिर्फ़ सिमटी हुई याँदोंक़ा सिललिसा होग़ा।
ज़ो लम्हे हैं चलो मुस्क़ुराक़र हंसक़र बिता लें।
ज़ाने क़ल ज़िंदग़ीक़ा क़्या फ़ैसला होग़ा।

10735
ख़ुशबू और प्यारक़ा रंग़़…
तेरा साथ हो, तेरा संग़…!!
मेरा मुस्क़ुराना, पलक़े ग़िराना और शरमाना,
सूरज़क़ी रोशनी, पर लाली- सी ओढनी…
शाममें ज़ैसे, रातक़ी ठंड़क़,
तेरा साथ हो, तेरा संग़….!!!