11111
एक़ लम्हेक़ी तवज़्ज़ोह नहीं,
हासिल उसक़ी…
और ये दिल क़ि,
उसे हदसे सिवा चाहता हैं…!
परवीन शाक़िर
11112
क़ोई हासिल न था आरज़ूक़ा मग़र,
सानेहा ये हैं अब आरज़ूभी नहीं…
वक़्तक़ी इस मसाफ़तमें बे-आरज़ू,
तुम क़हाँ ज़ाओग़े हम क़हाँ ज़ाएँग़े…
जौन एलिया
11113
इस इश्क़पें हमभी हँसते थे,
बे-हासिल सा बे-हासिल था l
इक़ ज़ोर बिफ़रते साग़रमें,
ना क़श्ती थी ना साहिल था ll
इब्न-ए-इंशा
इस इश्क़पें हमभी हँसते थे,
बे-हासिल सा बे-हासिल था l
इक़ ज़ोर बिफ़रते साग़रमें,
ना क़श्ती थी ना साहिल था ll
इब्न-ए-इंशा
11114
बज़्म-ए-अहबाबमें,
हासिल न हुआ चैन मुझे…
मुतमइन दिल हैं बहुत,
ज़बसे अलग़ बैठा हूँ …!
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर ग़ीलानी
11115
दिलसे हवा-ए-क़िश्त-ए-वफ़ा मिट ग़ई क़ि वाँ…
हासिल सिवाए हसरत-ए-हासिल नहीं रहा……
मिर्ज़ा ग़ालिब
दिलसे हवा-ए-क़िश्त-ए-वफ़ा मिट ग़ई क़ि वाँ…
हासिल सिवाए हसरत-ए-हासिल नहीं रहा……
मिर्ज़ा ग़ालिब