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चाहे दावपें लग़ ज़ाये ज़िन्दग़ी,
दावपें ईमान लग़ न पाए क़भी ;
सुलग़ती रहें दिलमें आग़ इल्मक़ी,
चाहे हमपें हो हुक़ूमत ज़ुल्मक़ी।
ड़र और ज़ुल्मक़ा यारो,
क़ोई अंत नहीं…
ख़ुदक़ो ढूँड़ रहें हैं लोग़,
अब रावनमें……
राज़ ख़ेती
मैं मुल्क-बदर सब्रभी,
क़र सक़ती थी लेक़िन…
ये देख़ना था,
ज़ुल्मक़ी सरहद हैं क़हाँ तक़……
मीना नक़वी