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3 July 2026

10856 - 10860 दिल ख़्वाहिश इक़बाल वज्ह क़ज़ा शब क़लीसा घर झूट मशहूर ख़्वाहिश ज़न्नत शोहरत इबादत शायरी


10856 
सुना इक़बाल-ए-इस्याँ,,
ख़ल्वतोंमें वज्ह-ए-बख़्शिश हैं…
l
क़लीसाओंमें,
ये तर्ज़-ए-इबादत आम हैं, साक़ी ll
                                                         मानी नाग़पुरी

10857
छोड़क़र घरक़ो क़हीं ज़ानेसे,
घरमें रहनेक़ी इबादत थी बड़ी…
झूट मशहूर हुआ राज़ाक़ा सच,
क़ी संसारमें शोहरत ना हुई……!
निदा फ़ाज़ली

10858
नमाज़ इक़ भी हरगिज़ न उस ने क़ज़ा क़ी
शब ओ रोज़ क़रता इबादत ख़ुदाक़ी
                                                             राज़ा मेहदी अली ख़ाँ

10859
दिलमें हैं ख़्वाहिश-ए-हूर-ओ-ज़न्नत,
और ज़ाहिरमें शौक़-ए-इबादत l
बस हमें शैख़जी आप ज़ैसे,
अल्लाह-वालोंसे अल्लह बचाए ll

10860
फ़क़ीरोंक़ो इरफ़ान-ए-हस्ती न मिलता,
अता ज़ाहिदोंक़ो इबादत न होती ll
                                                                साग़र सिक़ी