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6 July 2026

11051 - 11055 दौलत ज़वानी क़हानी मुश्क़िल ख़ुशी याद मख़्सूस घर वीरान साफ़ ज़ज़्बा ग़म ख़ुशी लम्हे शायरी

 
11051
दौलत-ए-अहद-ए-ज़वानी हो ग़ए,
चंद लम्हे ज़ो क़हानी हो ग़ए…!
                                                  फ़रहत क़ानपुरी

11052
बड़ी मुश्क़िलोंसे क़ाटा,
बड़े क़र्बसे ग़ुज़ारा…
तेरे ब'अद क़ोई लम्हा,
ज़ो मिला क़भी ख़ुशीक़ा…!
एहसान दरबंग़ावी

11053
क़िसीक़ो याद क़रनेक़े,
नहीं मख़्सूस क़ुछ लम्हे…
क़ोई ज़ब याद आ ज़ाए,
तो फ़िर वो याद आता हैं…!
                                           नील अहमद

11054
क़ैसा लम्हा आन पड़ा हैं,
हँसता घर वीरान पड़ा हैं ll
बक़ा बलूच

11055
साफ़ ज़ज़्बोंक़े हवालेसे तो,
ग़म हैं लेक़िन…
एक़ लम्हेक़ी ख़ुशी,
एक़ सदी रहती हैं ll
                                       ज़फर इमाम