21 July 2026

11111 - 11115 दिल इश्क़ वफ़ा हद लम्हे तवज़्ज़ोह आरज़ू सानेहा वक़्त क़श्ती साहिल साग़र बज़्म अहबाब हसरत हासिल शायरी

 
11111
एक़ लम्हेक़ी तवज़्ज़ोह नहीं,
हासिल उसक़ी…
और ये दिल क़ि,
उसे हदसे सिवा चाहता हैं…!
                                           परवीन शाक़िर

11112
क़ोई हासिल न था आरज़ूक़ा मग़र,
सानेहा ये हैं अब आरज़ूभी नहीं…
वक़्तक़ी इस मसाफ़तमें बे-आरज़ू,
तुम क़हाँ ज़ाओग़े हम क़हाँ ज़ाएँग़े…
जौन एलिया

11113
इस इश्क़पें हमभी हँसते थे,
बे-हासिल सा बे-हासिल था l
इक़ ज़ोर बिफ़रते साग़रमें,
ना क़श्ती थी ना साहिल था ll
                                             इब्न-ए-इंशा

11114
बज़्म-ए-अहबाबमें,
हासिल न हुआ चैन मुझे…
मुतमइन दिल हैं बहुत,
ज़बसे अलग़ बैठा हूँ …!
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर ग़ीलानी

11115
दिलसे हवा-ए-क़िश्त-ए-वफ़ा मिट ग़ई क़ि वाँ…
हासिल सिवाए हसरत-ए-हासिल नहीं रहा……
                                                                               मिर्ज़ा ग़ालिब

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