5 July 2026

11046 - 11050 दिल उम्र हसीन बेसब्र ज़रियाँ उलझने आलम बिख़र लिफ़ाफ़े लम्हे शायरी

 
11046
बड़े हसीन थे वो बेसब्र लम्हे,
ज़ो लिफ़ाफ़ेमें बंद थे...
ये फ़ोन क़्या चले साहिब…
बेसब्रीक़ा क़ोई ज़रियाँ न रहा....

11047
हवा शाख़ोंमें रुक़ने और,
उलझनेक़ो हैं,
इस लम्हे ग़ुज़रते बादलोंमें,
चाँद हाइल होनेवाला हैं ll
ज़फ़र इक़बाल

11048
एक़ लम्हेमें,
बिख़र ज़ाता हैं ताना-बाना…
और फ़िर,
उम्र ग़ुज़र ज़ाती हैं यक़ज़ाईमें……
                                                    अहमद मुश्ताक़

11049 
क़ितने आलम गुज़र गए मुझपर…
तुमक़ो सोचा था एक लम्हेक़ो……
नील अहमद

11050
एक लम्हेक़ो तुम मिले थे, मगर…
उम्रभर दिलक़ो हम मसलते रहें…
                                                      अर्श सिद्दीक़ी

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