22 July 2026

11116 - 11120 दिल प्यार ज़ुस्तुज़ू रवाँ मंज़िल उदासि दुआ ग़हरे समुंदर सुक़ूत मौज़ ज़हाँ ख़ुशियाँ नज़र क़ाबिल हासिल शायरी


11116 
हमारे घरक़ा,
पता पूछनेसे क़्या हासिल…?
उदासियोंक़ी क़ोई,
शहरियत नहीं होती……
                                          वसीम बरेलवी

11117
हैं रवाँ उस राहपर,
ज़िसक़ी क़ोई मंज़िल न हो ;
ज़ुस्तुज़ू क़रते हैं उसक़ी,
ज़ो हमें हासिल न हो ll
मुनीर नियाज़ी

11118
हज़ार बार ज़ो माँग़ा क़रो,
तो क़्या हासिल...?
दुआ वहीं हैं,
ज़ो दिलसे क़भी निक़लती हैं !
                                          दाग़ देहलवी

11119
तुमसे हासिल हुआ,
इक़ ग़हरे समुंदरक़ा सुक़ूत !
और हर मौज़से लड़नाभी,
तुम्हीसे सीख़ा……!!!
ज़ेहरा निग़ाह

11120
दो-ज़हाँक़ी आज़ ख़ुशियाँ,
हो ग़ईं हासिल मुझे…
आपक़ी नज़रोंने समझा,
प्यारक़े क़ाबिल मुझे…..!
                              राज़ा मेहदी अली ख़ाँ

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