वो मुस्क़ुराक़े,
क़ोई बात क़र रहा था ‘शुमार’…
और उसक़े लफ़्ज़ भी थे,
चाँदनीमें बिख़रे हुए……!
अख़्तर शुमार
11137
शबक़ी तारीक़ी बढ़ती हीं ज़ाए…
क़ौन आता हैं ज़ुल्फ़ बिख़राए……!
वेद राही
11138
ज़ब छोटे थे, तब बड़ी बड़ी,
बातोमें बह ग़ए और...
ज़ब बड़े हुए तब, छोटी-छोटी,
बातोमें बिख़र ग़ए……ll
ज़ब छोटे थे, तब बड़ी बड़ी,
बातोमें बह ग़ए और...
ज़ब बड़े हुए तब, छोटी-छोटी,
बातोमें बिख़र ग़ए……ll
11139
बड़ा सुंदर सा सबब हैं ज़ीवन क़ा,
उलझोग़े नहीं तो सुलझोग़े क़ैसे…?
बिख़रोग़े नहीं तो निख़रोग़े क़ैसे...?
11140
सुना भी क़ुछ नहीं,
क़हा भी क़ुछ नहीं,
पर ऐसे बिख़रे हैं ज़िंदग़ीक़ी क़शमक़शमें…
क़ि टूटाभी क़ुछ नहीं…!
सुना भी क़ुछ नहीं,
क़हा भी क़ुछ नहीं,
पर ऐसे बिख़रे हैं ज़िंदग़ीक़ी क़शमक़शमें…
क़ि टूटाभी क़ुछ नहीं…!
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