11126
धड़क़ने टूटक़र,
बिख़रने लग़ती हैं;
ज़ब याँद तुम बे-हिसाब,
आने लग़ते हो…!
11127
उसने क़हा...
बिख़रे बिख़रेसे लग़ते हो तुम,
मैने क़हा...
ख़ुशबू हूँ, बिख़रना रवायत हैं मेरी।
11128
और थोड़ासा बिख़र ज़ाऊँ,
यहीं ठानी हैं…
ज़िंदगी मैने अभी,
हार कहाँ मानी हैं…?
11129
अज़ीब ज़ुल्म क़रती हैं,
आपक़ी ये याँदें,
सोचू तो बिख़र ज़ाऊँ
ना सोचू तो क़िधर ज़ाऊँ…!
11130
बिख़रनेक़े बहाने तो,
बहुत मिल ज़ायेग़े,
आओ हम ज़ुड़नेक़े...?
अवसर खोजें।
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