16 July 2026

11086 - 11090 दिल मोहब्बत नावक़-ए-ज़फ़ा ग़म निग़ाह अंज़ाम क़िस्मत सुब्ह शाम सितम याद ग़ैर तड़प शायरी

 
11086
तड़प रहा हैं दिल,
इक़ नावक़-ए-ज़फ़ाक़े लिए…
उसी निग़ाहसे फ़िर देख़िए,
ख़ुदाक़े लिए……
                                  लाला माधव राम ज़ौहर

11087
तुम्हें दिललग़ी भूल ज़ानी पड़ेग़ी,
मोहब्बतक़ी राहोंमें आक़र…
तो देख़ो तड़पनेपें मेरे,
न फ़िर तुम हँसोग़े क़भी,
दिल क़िसीसे लग़ाक़र तो देख़ो ll
पुरनम इलाहाबादी

11088
क़भी तड़पा ग़या हैं दिल तिरा ग़म,
क़भी दिलक़ो सहारा दे ग़या हैं ll
                                                  फ़िराक़ ग़ोरख़पुरी

11089
मोहब्बत क़रनेवालोंक़ा,
यहीं अंज़ाम होता हैं l
तड़पना उनक़ी क़िस्मतमें तो,
सुब्ह-ओ-शाम होता हैं ll
राज़ा मेहदी अली ख़ाँ

11090
उनक़ो भूले हुए,
अपने ही सितम याद आए…
ज़ब क़िसी ग़ैरने तड़पाया,
तो हम याद आए……!
                                         सुदर्शन फ़ाक़िर

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