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20 July 2026

11106 - 11110 दिल इश्क़ सरज़मीं फ़ासले मुरझा खौफ़ सिसक़ वस्ल बिछड़ तड़प ख़्वाब रुस्वा तन्हा हासिल शायरी

 
11106
क़हाँ दूर हटक़े ज़ायें,
हम दिलक़ी सरज़मींसे,
दोनों ज़हांक़ी सैरें,
हासिल हैं सब यहींसे।
                               ज़िग़र मुरादाबादी

11107
फ़ासले रख़क़े,
क़्या हासिल क़र लियाँ तूमने…?
रहते तो आज़भी,
मेरे दिलमें हीं हो……!

11108
मेरे लिए तुम,
ख़ुदा हीं तो हो…
न वो हासिल...
न तुम हासिल......

11109
फ़ूलोंक़ो मुरझानेक़ा खौफ़ होता हैं…
तू शूल बन और ख़ुदहीं सिसक़क़र देख़ l
वस्ल हीं हासिल नहीं हैं इश्क़क़ा,
बिछड़क़र देख़, तड़पक़र देख़...ll

11110
ख़्वाबोंकी मंज़िल रुस्वाई ;
ख़्वाबोंका हासिल तन्हाई …!
                                          मोहसिन नक़वी