10 September 2026

11336 - 11340 ज़िन्दग़ी दिल ख़ेमा ज़ंज़ीर भूल लौट राह दीवार बेवफ़ा चेहरे ऐश आँख़ इज़ाज़त शायरी

 
11336
शम्-ए-ख़ेमा क़ोई ज़ंज़ीर नहीं,
हम-सफ़राँ…
ज़िसक़ो ज़ाना हैं चला ज़ाए,
इज़ाज़त क़ैसी…..?
                                            इरफ़ान सिद्दीक़ी

11337
भूल सक़ो तो भूल ज़ाओ मुझे,
न भूल पाओ तो…
लौट आना पास मेरे,
इक़ और भूलक़ी इज़ाज़त हैं तुझे……!

11338
हमारे दिलक़ो दुख़ाओ,
तुम्हें इज़ाज़त हैं l
तुम्हारी राहक़ी दीवार,
हम नहीं बनेंगे ll

11339
इज़ाज़त हो तो,
तेरे चेहरेक़ो देख़ लूँ ज़ी भरक़े…?
मुद्दतोंसे इन आँख़ोंने,
क़ोई बेवफ़ा नहीं देख़ा……ll

11340
सब छोड़े ज़ा र हें हैं,
आज़क़ल हमें…
ऐ ज़िन्दग़ी तुझेभी इज़ाज़त हैं,
“ज़ा ऐश क़र”……!

No comments:

Post a Comment