8 September 2026

11326 - 11330 ग़ुनहग़ार रक़ीब महफ़िल रौशनी नज़्ज़ारा हँस शिक़ायत सितम बात रात ज़ुबान इज़ाज़त शायरी

 
11326
आपक़ी मज़्लिस-ए-आ’लीमें अ’लर्रग़्म रक़ीब,
ब-इज़ाज़त ये ग़ुनहग़ार उठे और बैठे ll

                                                          अब्दुल रहमान एहसान देहलवी

11327
इज़ाज़त हो तो,
हम इस शम्अ'-ए-महफ़िलक़ो बुझा ड़ालें…
तुम्हारे सामने ये रौशनी,
अच्छी नहीं लग़ती ……!
पुरनम इलाहाबादी

11328
मुझे ग़र्म-ए-नज़्ज़ारा देख़ा,
तो हँसक़र वो बोले…
कि इसक़ी इज़ाज़त नहीं हैं ll

                                           हसरत मोहानी

11329
दे मुझक़ो शिक़ायतक़ी,
इज़ाज़त क़ि सितमग़र…
क़ुछ तुझक़ो मज़ाभी,
मेरे आसारमें आवे……
मिर्ज़ा ग़ालिब

11330
तुक़ शिक़ायतक़ी अब इज़ाज़त हो,
नहीं रुक़ती ज़ुबानपर बात l
तुमक़ो आना न था, न आए तुम,
रह ग़ई रातभरक़ी रात ll

                                                       दाग़ देहलवी

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