4 September 2026

11306 - 11310 बोसा मोहब्बत बरहम बेताबी ख़ता चाह नज़र ज़ुल्फ़ तबाह ख़ूबसूरत दाम साक़ी इज़ाज़त शायरी

 
11306
न हो बरहम ज़ो बोसा,
बे-इज़ाज़त ले लिया मैने…
चलो ज़ाने दो,
बेताबीमें ऐसा हो ही ज़ाता हैं...!
                                             ज़लाल लख़नवी

11307
सुनो,
एक़ ख़ता हो ग़ई हैं,
हमने तुमक़ो…
तुमसे चुराया हैं,
तुम्हारी इज़ाज़तक़े बग़ैर…

11308
मैं चाहता हूँ क़ि,
तुमही मुझे इज़ाज़त दो…
तुम्हारी तरहसे क़ोई,
ग़ले लगाए मुझे……
                                        बशीर बद्र

11309
इज़ाज़त तो हमने भी न दी थी,
उसे मोहब्बतक़ी,
बस वो नज़र उठाते ग़ए,
और हम तबाह होते ग़ए !

11310
इज़ाज़त हो तो,
मैं तस्दीक़ क़र लूँ, तेरी ज़ुल्फ़ोंसे…
सुना हैं ज़िंदगी इक़,
ख़ूबसूरत दाम हैं साक़ी
                                                   अब्दुल हमीद अदम

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