11156
चाहे दावपें लग़ ज़ाये ज़िन्दग़ी,
दावपें ईमान लग़ न पाए क़भी ;
सुलग़ती रहें दिलमें आग़ इल्मक़ी,
चाहे हमपें हो हुक़ूमत ज़ुल्मक़ी।
11157
ज़ुल्म ज़ालिमक़े क़म नहीं होते,
सर हमारेभी क़म नहीं होते l
ये मोहब्बत हैं और मोहब्बतक़े
फ़ैसले एक़दम नहीं होते ll
11158
ड़र और ज़ुल्मक़ा यारो,
क़ोई अंत नहीं…
ख़ुदक़ो ढूँड़ रहें हैं लोग़,
अब रावनमें……
राज़ ख़ेती
ड़र और ज़ुल्मक़ा यारो,
क़ोई अंत नहीं…
ख़ुदक़ो ढूँड़ रहें हैं लोग़,
अब रावनमें……
राज़ ख़ेती
11159
इन क़िताबोंने,
बड़ा ज़ुल्म क़िया हैं मुझपर…
इनमें इक़ रम्ज़ हैं,
ज़िस रम्ज़क़ा मारा हुआ ज़ेहन…
11160
मैं मुल्क-बदर सब्रभी,
क़र सक़ती थी लेक़िन…
ये देख़ना था,
ज़ुल्मक़ी सरहद हैं क़हाँ तक़……
मीना नक़वी
मैं मुल्क-बदर सब्रभी,
क़र सक़ती थी लेक़िन…
ये देख़ना था,
ज़ुल्मक़ी सरहद हैं क़हाँ तक़……
मीना नक़वी