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11 July 2026

10896 -10900 दिल बेक़रार ख़टक़ फ़ित्ना इख़्तियार चश्म-ए-निग़राँ ज़ल्वे अंज़ाम बेताब तड़प शायरी

 
10896
ख़टक़ रहीं हैं क़ोई,
शय निक़ाल दे क़ोई l
तड़प रहा हैं,
दिल-ए-बे-क़रार सीनेमें…ll
                                       मुबारक़ अज़ीमाबादी

10897
निक़ले मिरी बग़लसे,
वो ऐसे तड़पक़े साथ…
याँद आ ग़याँ मुझे,
वहीं बे-इख़्तियाँर दिल……
दाग़ देहलवी

10898
ज़ल्वे बेताब थे,
ज़ो पर्दा-ए-फ़ितरतमें 'ज़िग़र'…
ख़ुद तड़पक़र मिरी,
चश्म-ए-निग़राँ तक़ पहुँचे……
                                               ज़िग़र मुरादाबादी

10899
सितम तो ये हैं क़ि,
अंज़ाम बनक़े आए हैं…
हमारे दिलक़ी तड़प,
आज़ क़ुछ तो क़ाम आए……
तस्लीम फ़ाज़ली

10900
ज़हाँ भी था क़ोई फ़ित्ना,
तड़पक़े ज़ाग़ उठा…
तमाम होश थी,
मस्तीमें तेरी अंग़ड़ाई……!
                                       नासिर क़ाज़मी