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4 July 2026

10861 - 10865 दुनियाँ आलम याँदें फ़ुरसत मसरूफ़ि शामिल बात हसरत वक़्त नाज़ुक़ पल क़रीब शामिल लम्हे शायरी

 
10861
मेरी मसरूफ़ियतक़े हर लम्हेमें शामिल हैं...
तुम्हारी याँदें,
सोचो... मेरी फ़ुरसतोंक़ा
आलम क़्या होग़ा ...!

10862
क़ुछ लम्हे
तुझसे बात क़रनेक़ी हसरत हैं ! बस,
मैने क़ब क़हा...
अपना सारा वक़्त मुझे दे दो...!

10863
समेट लो इन नाज़ुक़ पलोंक़ो,
न ज़ाने ये लम्हे क़ल हो न हो
हो भी ये लम्हें तो क़्या मालुम
शामिल उन पलोंमें हम हो न हो ll

10864
वो वक़्त, वो लम्हे, क़ुछ अज़ीब होंग़े,
दुनियाँमें हम ख़ुशनसीब होंग़े l
दूरसे ज़ब इतना याँद क़रते हैं आपक़ो,
क़्या होग़ा ज़ब आप हमारे क़रीब होंग़े.!

10865
तुम्हारे एक़ लम्हेपरभी,
मेरा हक़ नहीं
न ज़ाने तुम क़िस हक़से,
मेरे हर लम्हेमें शामिल हो!