10796
छेड़क़र ज़ैसे गुज़र ज़ाती हैं,
दोशीज़ा हवा l
देरसे ख़ामोश हैं,
ग़हरा समुंदर और मैं ll
ज़ेब ग़ौरी
10797
रात सुनसान हैं,
ग़ली ख़ामोश…
फ़िर रहा हैं,
इक़ अज़नबी ख़ामोश…
नासिर ज़ैद
10798
क़ुछ क़हनेक़ा वक़्त नहीं ये,
क़ुछ न क़हो ख़ामोश रहो l
ऐ लोग़ो ख़ामोश रहो,
हाँ ऐ लोग़ो ख़ामोश रहो ll
इब्न-ए- इंशा
क़ुछ क़हनेक़ा वक़्त नहीं ये,
क़ुछ न क़हो ख़ामोश रहो l
ऐ लोग़ो ख़ामोश रहो,
हाँ ऐ लोग़ो ख़ामोश रहो ll
इब्न-ए- इंशा
10799
सबने देख़ा और,
सब ख़ामोश थे l
एक़ सूफ़ीक़ा मज़ार,
उड़ता हुआ ll
ख़ुर्शीद तलब
10800
देख़ोग़े तो आएगी,
तुम्हें अपनी ज़फ़ा याद…
ख़ामोश ज़िसे पाओग़े,
ख़ामोश न होग़ा……
अंज़ुम रूमानी
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