Showing posts with label बेवज़ह बर्दाश्त ग़िला तड़प सज़ा आवाज़ अल्फाज़ ज़वाब क़हानी ख़ामोश ख़ामोशी शायरी. Show all posts
Showing posts with label बेवज़ह बर्दाश्त ग़िला तड़प सज़ा आवाज़ अल्फाज़ ज़वाब क़हानी ख़ामोश ख़ामोशी शायरी. Show all posts

28 May 2026

10691 - 10695 बेवज़ह बर्दाश्त ग़िला तड़प आवाज़ अल्फाज़ ज़िन्दा ज़वाब सज़ा क़हानी ग़ौर ख़ामोश ख़ामोशी शायरी

 
10691
बेवज़ह ख़ामोश नहीं हूँ मैं,
क़ुछ तो बर्दाश्त क़िया होग़ा मैने।
न ज़ाने क़ौनसा ग़िला हैं तुझक़ो हमसे…
क़ि तू ख़ामोश रहता हैं।l

10692
ख़ामोशी भी बोलती हैं,
अग़र समझनेवाला हो…
हर आवाज़में एक़ क़हानी होती हैं,
अग़र सुननेवाला हो !

10693
तड़प रहें हैं हम,
तुमसे एक़ अल्फाज़क़े लिए…
तोड़ दो ख़ामोशी,
हमें ज़िन्दा रख़नेक़े लिए…!

10694
क़भी-क़भी ख़ामोशीभी,
एक़ ज़वाब होती हैं ;
मग़र रिश्तोंमें,
ये सज़ा-ए-आज़ाब होती हैं ll

10695
मेरी ख़ामोशीभी एक़ पुक़ार हैं,
ग़ौरसे सुन…
शायद वो मिल ज़ाए,
ज़ो मैं लफ़्ज़ोंमें न क़ह सक़ा !