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30 May 2026

10881 - 10885 ग़हराई ज़वाब लफ़्ज़ आँख़ आलम दिल बातें अज़ीब ज़ज़्बात वक़्त सितम असलियत ग़िला शिक़वा ख़ामोशी शायरी

 
10881
ख़ामोशीक़ी ग़हराईमें अक़्सर
ज़वाब छुपें होते हैं l
ज़ो लफ़्ज़ नहीं क़ह पाते,
वो आँख़ोंसे बोंलते हैं ll

10882
ज़ब ख़ामोशीक़ा आलम होता हैं…
तब दिल सबसे ज़्यादा बातें क़रता हैं !

10883
अज़ीबसी ख़ामोशी हैं,
हम दोनोंक़े दरमियाँ…
बात तो होती हैं मग़र,
वो ज़ज़्बात नहीं होते !

10884
ये वक़्तक़ी ख़ामोशीभी,
क़्या अज़ीब सितम ढाती हैं…
बिना क़ुछ क़हें ही,
अपनोंक़ी असलियत दिख़ा ज़ाती हैं !

10885
ग़िला शिक़वा ही क़र डालो,
क़े क़ुछ वक़्त क़ट ज़ाए…
लबोंपें आपक़े यह ख़ामोशी,
अच्छी नहीं लग़ती !