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23 April 2026

10706 - 10710 मुट्ठि एहसान हाल मरहम तरफ़दार तलबगार शहर छिड़क़ नमक़ ज़ख़्म शायरी

 
10706
मुट्ठियोमें लिए फ़िरते हैं,
नमक़ आज़क़े लोग़…
अपने ज़ख़्मोंक़ो,
क़िसी हाल दिख़ाया न क़रो……

10707
एहसान क़िसीक़ा वो रख़ते नहीं...
मेरा भी लौटा दियाँ...
ज़ितना ख़ायाँ था नमक़ मेरा,
मेरे हीं ज़ख़्मोंपर लग़ा दियाँ......

10708
मरहमक़े नहीं हैं ये,
तरफ़-दार नमक़क़े…
निक़ले हैं मिरे ज़ख़्म,
तलबगार नमक़क़े…!

10709
क़हाँ ज़ख़्म ख़ोल बैठा पग़ले,
ये नमक़क़ा शहर हैं ......!

10710
क़ोई छिड़क़ता हैं,
ज़ख़्मोंपर नमक़ l
क़ोई उनका,
मरहम बन ज़ाता हैं ll