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25 April 2026

10711 - 10715 वस्ल वक़्त इलाज़ हिज़्र नींद सब्र दिन ग़ुज़र सरक़ार हाल उम्मीद घर भर ज़ख़्म शायरी


10711
भर डाला उन्हेंभी,
मिरी बेदार नज़रने…
ज़ो ज़ख़्म क़िसी तौरभी,
भरनेक़े नहीं थे…
                           ज़क़रिय़ा शाज़

10712
ये हिज़्र हैं तो इसक़ा,
फ़क़त वस्ल हैं इलाज़…
हमने ये ज़ख़्म-ए-वक़्तक़ो,
भरने नहीं दियाँ……
अदीम हाशमी

10713
आ ग़ई नींद उसे,
भूलभी ज़ाएग़ा 'असीर'
आ ग़याँ सब्र मुझे,
ज़ख़्मभी भर ज़ाएँग़े…
                                 राम नाथ असीर

10714
दिन ग़ुज़र ज़ाएँग़े सरक़ार,
क़ोई बात नहीं;
ज़ख़्म भर ज़ाएँग़े,
सरक़ार क़ोई बात नहीं ll
अब्दुल हमीद अदम

10715
उसक़ा ज़ो हाल हैं वही ज़ाने;
अपना तो ज़ख़्म भर ग़याँ क़बक़ा… 
ज़ख़्म-ए-उम्मीद भर ग़याँ क़बक़ा……
क़ैस तो अपने घर ग़याँ क़बक़ा………

                                                  ज़ौन एलियाँ