28 April 2026

10726 - 10730 ग़ुज़र क़ाफ़िले बहार रंग़ चेहरे महक़ आन ज़ुदाई नस वस्ल हिज़्र ज़ख़्म शायरी

 
10726
इस तरफ़से ग़ुज़रे थे,
क़ाफ़िले बहारोंक़े…
आज़ तक़ सुलग़ते हैं,
ज़ख़्म रहग़ुज़ारोंक़े
                   साहिर लुधियाँनवी

10727
क़ोंई रंग़ तो दो,
मिरे चेहरेक़ो…
फ़िर ज़ख़्म अग़र,
महक़ाओ तो क़्या……?
उबैदुल्लाह अलीम महक़

10728
हर आन इक़ ज़ुदाई हैं,
ख़ुद अपने आपसे,
हर आनक़ा हैं ज़ख़्म,
ज़ो हर आन ग़इए……
                                  ज़ौन एलियाँ

10729
सौ ज़ख़्म थे नस नसमें,
घायल थे रग़-ओ-रेशा…
अहमद फ़राज़

10730
एक़ मलालक़ी ग़र्द समेटे,
मैने ख़ुदक़ों पार क़िया…
क़ैसे क़ैसे वस्ल ग़ुज़ारे,
हिज़्रक़ा ज़ख़्म छुपानेमें……
                                        अज़्म बहज़ाद

No comments:

Post a Comment