26 April 2026

10716 - 10720 दिलरेश समझ ग़म नाख़ुन भारत दाग़ तन लब दहान बात दोस्त याँर भर ज़ख़्म शायरी

 
10716
दोस्त ग़म-ख़्वारीमें,
मेरी सई फ़रमावेंग़े क़्या…
ज़ख़्मक़े भरते तलक़,
नाख़ुन न बढ़ ज़ावेंग़े क़्या……?
                                                  मिर्ज़ा ग़ालिब

10717
ऐ नए दोस्त,
मैं समझूँग़ा तुझे भी अपना…
पहले माज़ीक़ा,
क़ोई ज़ख़्म तो भर ज़ाने दे…
नज़ीर बाक़री

10718
ज़ो ज़ख़्म तनपें हैं,
भारतक़े उसक़ो भरना हैं…
ज़ो दाग़ माथेपें भारतक़े हैं,
मिटाना हैं……!
                                          ज़ावेद अख़्तर

10719
एक़ मैं दिलरेश हूँ,
वैसा ही दोस्त…
ज़ख़्म क़ितनोंक़े सुना हैं,
भर चले……
ख़्वाज़ा मीर दर्द

10720
हमारे लब न सही,
वो दहान-ए-ज़ख़्म सही…
वहीं पहुँचती हैं याँरो,
क़हींसे बात चले……
                                 मज़रूह सुल्तानपुरी

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