10646
देख़ दिलक़े निग़ार-ख़ानेमें,
ज़ख़्म-ए-पिन्हाँक़ी हैं निशानी भी…
फ़िराक़ गोरख़पुरी
10647
अब तो ये आरज़ू हैं क़ि,
वो ज़ख़्म ख़ाइए…
ता-ज़िंदग़ी ये दिल,
न क़ोई आरज़ू क़रे
अहमद फ़राज़
10648
ज़ख़्म आँख़ोंक़े भी सहते थे,
क़भी दिलवाले…
अब तो अबरूक़ा इशारा,
नहीं देख़ा ज़ाता……
मोहसिन नक़वी
ज़ख़्म आँख़ोंक़े भी सहते थे,
क़भी दिलवाले…
अब तो अबरूक़ा इशारा,
नहीं देख़ा ज़ाता……
मोहसिन नक़वी
10649
बिछड़ा हैं ज़ो इक़ बार,
तो मिलते नहीं देख़ा…
इस ज़ख़्मक़ो हमने,
क़भी सिलते नहीं देख़ा…
परवीन शाक़िर
10650
अभी हम ख़ूबसूरत हैं,
हमारे जिस्म औराक़-ए-ख़िज़ानी हो गए हैं l
और रिदा-ए-ज़ख़्म से आरास्ता हैं ll
फ़िर भी देख़ो तो
हमारी ख़ुश-नुमाईपर कोई हर्फ़,
और कशीदा-कामतीमें ख़म नहीं आया…
अहमद फ़राज़
अभी हम ख़ूबसूरत हैं,
हमारे जिस्म औराक़-ए-ख़िज़ानी हो गए हैं l
और रिदा-ए-ज़ख़्म से आरास्ता हैं ll
फ़िर भी देख़ो तो
हमारी ख़ुश-नुमाईपर कोई हर्फ़,
और कशीदा-कामतीमें ख़म नहीं आया…
अहमद फ़राज़
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