3 April 2026

10641 - 10645 दिल नज़र अश्क़ चूम दस्त ज़िग़र नींद ख़्वाब वहशत आफ़त ज़ौहर सर देख़ ज़ख़्म शायरी

 

10641
हर एक़ ज़ख़्मक़ो,
अश्क़ोंसे धोक़े चूम लिया;
मैं ऐसे ठीक़ हुआ,
उसक़ी देख़-भालक़े बाद…!
                                              वरुन आनन्द

10642
नज़र लग़े न क़हीं उसक़े,
दस्त-ओ-बाज़ूक़ो…
ये लोग़ क़्यूँ मिरे,
ज़ख़्म-ए-ज़िग़रक़ो देख़ते हैं…?
मिर्ज़ा ग़ालिब

10643
नींद पिछली सदीक़ी ज़ख़्मी हैं;
ख़्वाब अग़ली सदीक़े देख़ते हैं ll
                                                   राहत इंदौरी

10644
वहशत-ए-ज़ख़्म-ए-वफ़ा,
देख़ क़ि सर-ता-सर दिल…
बख़ियाँ जूँ ज़ौहर-ए-तेग़,
आफ़त-ए-ग़ीराई हैं…ll
मिर्ज़ा ग़ालिब

10645
रुत बदलने लग़ी,
रंग़-ए-दिल देख़ना,
रंग़-ए-ग़ुलशनसे अब,
हाल ख़ुलता नहीं l
ज़ख़्म छलक़ा क़ोई,
याँ क़ोई ग़ुल ख़िला…
अश्क़ उमडे क़ि,
अब्र-ए-बहार आ ग़या…
                              फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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