8 April 2026

10666 - 10670 दिल ज़िंदगी निख़र हिज़्र ख़ौफ़ पत्थर भेद समझ आँखें नसीब ख़ून ख़ुशी ज़ख़्म शायरी


10666
बहुत अज़ीज़ हैं दिलक़ो,
ये ज़ख़्म ज़ख़्म रुतें…
इन्ही रुतोंमें निख़रती हैं,
तेरे हिज़्रक़ी शाम……
                               मोहसिन नक़वी

10667
मैं चाहता हूँ क़ि,
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हो ज़ाऊँ…
और इस तरह क़ि,
क़भी ख़ौफ़-ए-इंदिमाल न हो ll
ज़व्वाद शैख़

10668
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हुआ,
ज़ब तो मुझपें भेद ख़ुला…
क़ि पत्थरोंक़ो समझती रहीं,
ग़ुहर आँखें……
                                         मोहसिन नक़वी

10669 
मिरे दिलमें ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं,
मुझे ताब-ए-ज़ब्त रही नहीं...
मैं अलम-नसीब हूँ,
आज-कल मिरी ज़िंदगीमें ख़ुशी नहीं ll
अज़ीज़ क़ादरी

10670
ज़ख़्म-हा-ज़ख़्म हूँ,
और क़ोई नहीं ख़ूँ क़ा निशाँ…
क़ौन हैं वो ज़ो मिरे ख़ूनमें,
तर हैं मुझमें……
                                            ज़ौन एलियाँ

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