10686
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-तमन्नासे,
हूँ सरग़र्म-ए-सफ़र,
वर्ना क़ब मंज़ूर थी,
ये ज़ादा-पैमाई मुझे ll
एहसान नानपर्वी
10687
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र,
तल्ख़ी-ए-सहबा-ए-ज़ुनूँ…
अब क़ोई चीज़,
तिरे ग़मक़े सिवा याँद नहीं…!
इशरत ज़ालंधरी
10688
इक़ उम्र चाहिए क़ि,
ग़वारा हो नीश-ए-इश्क़…
रक्ख़ी हैं आज़,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र क़हाँ…
अल्ताफ़ हुसैन हाली
10689
देग़ी न चैन लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म,
उस शिक़ारक़ो
ज़ो ख़ाक़े तेरे हाथक़ी,
तलवार ज़ाएग़ा…
मीर तक़ी मीर
10690
मिज़्ग़ाँ हरीफ़-ए-क़ाविश-ए-नाख़ुन,
न हो सक़ीं …
सोज़िश तो हैं पे,
लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-ज़िग़र नहीं…
अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद
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