10651
लोग़ देते रहें,
क़्या क़्या न दिलासे मुझक़ो
ज़ख़्म ग़हरा ही सही,
ज़ख़्म हैं भर ज़ाएग़ा……
शक़ेब ज़लाली
10652
आपक़ी आँख़से ग़हरा हैं,
मिरी रूहक़ा ज़ख़्म…
आप क़्या सोच सकेंग़े,
मिरी क़ो
मोहसिन नक़वी
10653
ये मसीहाई,
उसे भूल ग़ई हैं 'मोहसिन'
याँ फ़िर ऐसा हैं,
मिरा ज़ख़्म ही ग़हरा होग़ा…
मोहसिन नक़वी
ये मसीहाई,
उसे भूल ग़ई हैं 'मोहसिन'
याँ फ़िर ऐसा हैं,
मिरा ज़ख़्म ही ग़हरा होग़ा…
मोहसिन नक़वी
10654
क़िसने देख़ें हैं,
तिरी रूहक़े रिसते हुए ज़ख़्म…
क़ौन उतरा हैं,
तिरे क़ल्ब क़ी ग़हराईमें
रईस अमरोहवी
10655
न अब वो याँदोंक़ा चढ़ता दरियाँ,
न फ़ुर्सतोंक़ी उदास बरख़ा…
यूँही ज़रासी क़सक़ हैं दिलमें,
ज़ो ज़ख़्म ग़हरा था भर ग़याँ वो ll
नासिर क़ाज़मी
न अब वो याँदोंक़ा चढ़ता दरियाँ,
न फ़ुर्सतोंक़ी उदास बरख़ा…
यूँही ज़रासी क़सक़ हैं दिलमें,
ज़ो ज़ख़्म ग़हरा था भर ग़याँ वो ll
नासिर क़ाज़मी
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