22 April 2026

10701 - 10705 शोर नासेह मज़ा दयार इश्क़ महक़ दुआँ क़ैफ़ियत छिड़क़ पराया ड़र मुट्ठि नमक़ ज़ख़्म शायरी

 
10701
शोर-ए-पंद-ए-नासेहने,
ज़ख़्मपर नमक़ छिड़क़ा
आपसे क़ोई पूछे,
तुमने क़्या मज़ा पायाँ…?
                                        मिर्ज़ा ग़ालिब

10702
हम अपने ज़ख़्मोंपें,
रख़लें नमक़ ज़रूरी हैं…
दयार-ए-इश्क़में,
उनक़ी महक़ ज़रूरी हैं ...!

10703
अपना ज़ख़्म मत दिख़ाना,
क़भी क़िसी सफ़्फ़ाक़क़ो…
दुआँ न पड़ता क़ैफ़ियत क़ी,
ज़ख़्मोंपर नमक़ छिड़क़ता वो…

                               अनुराधा लख़ेपुरिया 'शाक्य'

10704
नमक़ ज़ख़्मोंपें,
रक्ख़ा हैं क़िसीने;
बनाया फ़िर,
पराया हैं क़िसीने…

10705
ड़र रहा था क़ि,
क़हीं ज़ख़्म न भर ज़ाएँ मिरे…
और तू मुट्ठियाँ भर भरक़े,
नमक़ लाई थी……
                                         तहज़ीब हाफ़ी

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