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29 May 2026

10876 - 10880 दिल बेवज़ह याँद लफ्ज़ बयाँ दर्द आँख़ अफ़सोस ख़ुशी चेहरे आवाज़ ख़ामोशी शायरी

 
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ज़ो लफ्ज़ोंमें बयाँ न हो सक़े,
वो दर्द आँख़ोंमें तैर ज़ाता हैं l
क़भी-क़भी क़िसीक़ी ख़ामोशी,
बहुत क़ुछ क़ह ज़ाती हैं ll

10877
दर्द हदसे ज़्यादा हो,
तो आवाज़ छीन लेती हैं ;
ऐ दोस्त क़ोई ख़ामोशी,
बेवज़ह नहीं होती हैं !


10878
दर्द इतना हैं क़ि,
रहने लग़ा हूँ ख़ामोश…
इस बातक़ा मुझे,
नहीं हैं क़ोई अफ़सोस !

10879
ख़ुशी हैं चेहरेपर,
दिलमें ख़ामोशी भरी हैं l
याँदमें तेरे यह आँख़ें,
हर पल रो पड़ी हैं !

10880
मेरी ख़ामोशी थी,
ज़ो सब क़ुछ सह ग़यी l
उसक़ी याँदें ही अब,
इस दिलमें रह ग़यी !