Showing posts with label माथे अज़ीज़ रुस्वाइ ग़िला रफ़ूग़र शहर पत्थर ज़ज़्बात सिले ज़ख़्म शायरी. Show all posts
Showing posts with label माथे अज़ीज़ रुस्वाइ ग़िला रफ़ूग़र शहर पत्थर ज़ज़्बात सिले ज़ख़्म शायरी. Show all posts

4 May 2026

10756 - 10560 माथे अज़ीज़ रुस्वाइ अग़्यार ग़िला रफ़ूग़र याँर हाथ सिले शहर पत्थर ज़ज़्बात ज़ख़्म शायरी


10756
शहज़ादी तिरे माथेपर,
ये ज़ख़्म रहेंग़ा…l
लेक़िन इसक़ों चूमनेवाला,
फ़िर नहीं होग़ा……ll
                                       सरवत हुसैन

10757
वो बाम ओ दर वो लोग़,
वो रुस्वाइयोंक़े ज़ख़्म…
हैं सबक़े सब अज़ीज़,
ज़ुदा उस ग़लीमें चल……
हबीब ज़ालिब

10778
हमक़ों अग़्यारक़ा ग़िला क़्या हैं…
ज़ख़्म ग़एँ हैं हमने याँरोंसे……!
                                          साहिर होशियाँरपुरी

10759
अभीसे मेरे रफ़ूग़रक़े,
हाथ थक़ने लग़े…
अभी तो चाक़ मिरे ज़ख़्मक़े,
सिलेभी नहीं……
परवीन शाक़िर

10760
आख़िरी बार मिलो,
हैं शहरमें क़हत पत्थरोंक़ा l
ज़ज़्बातक़े ज़ख़्म,
ग़ रहा हूँ…ll
                                      क़तील शिफ़ाई