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2 June 2026

10716 - 10720 ज़िन्दग़ी याँद तमन्ना ग़िरवी पसंद फ़र्क़ क़माल लफ्ज़ इत्तेफ़ाक़ रूठी क़ीमत तरक़ीब बहाने मुस्क़ुरा शायरी

 
10716
हमें बस मुस्क़ुराना पसंद हैं,
फ़िर...
हमारा हो या तुम्हारा...
फ़र्क़ क़्या पड़ता हैं......
!!! 

10717
मुस्क़ुराहट एक़,
क़मालक़ी पहें हैं l
ज़ितना बताती हैं,
उससे क़हीं ज़्यादा छुपाती हैं ll

10718
लफ्ज़ोंक़े इत्तेफ़ाक़में,
यूँ बदलाव क़रक़े देख़ l
तू देख़क़र न मुस्क़ुरा,
बस मुस्क़ुराक़े देख़ !

10719
तू रूठी रूठीसी लग़ती हैं,
क़ोई तरक़ीब बता मनानेक़ी,
मैं ज़िन्दग़ी ग़िरवी रख़ दूंग़ा,
तू क़ीमत बता मुस्क़ुरानेक़ी।

10720
मुस्क़ुरानेक़े अब,
बहाने नहीं ढूंढ़ने पड़ते…
तुझे याँद क़रते हैं तो,
तमन्ना पूरी हो ज़ाती हैं !