21 August 2026

11246 - 11250 पल रिश्ते रफ़ू मिल बेनूर चिराग़़ उज़ाला ग़म क़म बिछड़ शायरी

 
11246
पलोंक़ी उधेड़ बुनमें,
ना ज़ाने क़ितने रिश्ते उधड़ ग़ए, 
मैं रफ़ू क़रता रहा,
ना ज़ाने फ़िरभी अपने क़्यों बिछड़ ग़ए।

11247
ख़ुदक़ों मुझमें,
छोड़ ग़ई हैं वो...
उसे तो ठीक़से,
बिछड़नाभी नहीं आता...

11248
एक़ तुमही न मिल सक़े,
वरना... मिलनेवाले तो…
बिछड़ बिछड़क़े मिले……

11249
बेनूरसी लग़ती हैं,
तुमसे बिछड़क़र ये रातें,
चिराग़़ तो ज़लते हैं,
मग़र उज़ाला नहीं क़रते।

11250
बिछड़क़र हमसे वो पूछते रहें,
‘क़ोई ग़म हैं क़्या…?’
हमने क़हा, ‘ज़ी रहें हैं हम’,
ये क़म हैं क़्या……?

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