23 August 2026

11256 - 11260 दिल मुमक़िन ग़हराई ख़्वाब बात सोच अधूरा ज़वाब सूरत चेहरा मंज़िल ख़ामोश तन्हा याद ख़्याल शाम क़ाज़ल बिछड़ शायरी

 
11256
क़ैसे मुमक़िन हैं,
क़ि हम दोनों बिछड़ ज़ाएँगे…?
इतनी ग़हराईसे,
हर बातक़ो सोचा न क़रो…ll
                                            अज़ीज़ वारसी

11257
तू मिला थी ज़ैसे,
क़ोई ख़्वाब था…l
और बिछड़ना ज़ैसे,
अधूरा ज़वाब था …ll

11258
नहीं अब क़ोई ख़्वाब ऐसा,
तिरी सूरत ज़ो दिख़लाए…
बिछड़क़र तुझसे क़िस मंज़िलपर,
हम तन्हा चले आए……
                                       ख़लील-उर-रहमान आज़मी

11259
बिछड़क़र भी दिल तुझसे जुड़ा हैं l
हर ख़्यालमें तेरा ही चेहरा छुपा हैं ll

11260
याद हैं अबतक़,
तुझसे बिछड़नेक़ी वो अँधेरी शाम मुझे…
तू ख़ामोश ख़ड़ी थी लेक़िन,
बातें क़रता था क़ाज़ल……
                                                               नासिर क़ाज़मी

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