22 March 2026

10591 - 10595 आँख़ बात तौर सफ़र ज़िन्दग़ी दुनियाँ मोड़ सबक़ नमक़ रंग़ क़मान ख़ुश्बू तीर मरहम ज़ख़्म शायरी


10591 
ज़ख़्म तो हमने,
इन आँख़ोंसे देख़े हैं…
लोग़ोंसे सुनते हैं,
मरहम होता हैं ll
                           ज़ावेद अख़्तर

10592
ज़ख़्म हर ज़ग़ह हैं,
क़हीं मरहम नहीं मिलता,
मैं-मैंक़ी रट हर ज़ग़ह हैं,
मग़र क़हीं हम नहीं मिलता। 

10593
बात बे-तौर हो ग़ई शायद…
ज़ख़्मभी अब नहीं हैं, मरहमज़ी…
                                                     ज़ौन एलियाँ

10594
ये सफ़र-ऐ-ज़िन्दग़ी हैं,
यहाँ हर मोड़पर सबक़ हैं,
ये दुनियाँ दिख़ाती मरहम हैं,
लग़ाती नमक़ हैं।

10595
इक़ रंग़सी क़मान हो,
ख़ुश्बूसा एक़ तीर…
मरहमसी वारदात हो,
और ज़ख़्म ख़ाऊँ मैं…
                                ज़ौन एलियाँ

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