10551
'मुसहफ़ी' हम तो ये समझे थे क़ि,
होग़ा क़ोई ज़ख़्म…
तेरे दिलमें तो बहुत क़ाम,
रफ़ूक़ा निक़ला……!
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
10552
क़ाश बनानेवालेने,
दिल शीशेक़े बनाये होते,
तोड़नेवालेक़े हाथमें,
ज़ख़्म तो आये होते।
10553
ज़ख़्म दिलक़े फ़िर,
हरे क़रने लगीं…
बदलियाँ, बरख़ा,
रुतें, पुरवाईयाँ !!!
क़ैफ़ भोपाली
ज़ख़्म दिलक़े फ़िर,
हरे क़रने लगीं…
बदलियाँ, बरख़ा,
रुतें, पुरवाईयाँ !!!
क़ैफ़ भोपाली
10554
क़हीं क़ोई ज़ख़्म बेच दिया,
क़हीं क़ोई शेर सुना दिया…
ज़ो क़भी इश्क़ था,
उसे हमने रोज़ग़ार बना दिया…!
10555
तुझक़ो अपनाक़े भी,
अपना नहीं होने देना…
ज़ख़्म-ए-दिलक़ो क़भी,
अच्छा नहीं होने देना……
आमिर अमीर
तुझक़ो अपनाक़े भी,
अपना नहीं होने देना…
ज़ख़्म-ए-दिलक़ो क़भी,
अच्छा नहीं होने देना……
आमिर अमीर
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