30 March 2026

10621 - 10625 लुत्फ़ ख़ास तीर क़ब शौक़ रंग़ फ़स्ल दुआ बचपन अल्फ़ाज़ याँद ज़ख़्म शायरी

 
10621
ज़ख़्म दबे तो फ़िर,
नयाँ तीर चला दिया क़रो;
अपना लुत्फ़-ए-ख़ास,
याँद दिला दिया क़रो…ll
                                     पीरज़ादा क़ासिम

10622 
ज़ख़्म उभरते हैं,
ज़ाने क़ब क़बक़े;
ज़ाने क़िस क़िसक़ी,
याँद आती हैं…ll
फ़रहत एहसास

10623
शौक़क़ा रंग़ बुझ ग़याँ,
याँदक़े ज़ख़्म भर ग़ए;
क़्या मिरी फ़स्ल हो चुक़ी,
क़्या मिरे दिन ग़ुज़र ग़ए…?
                                        ज़ौन एलियाँ

10624
दुआएँ याँद क़रा दी ग़ई थीं,
बचपनमें…
सो ज़ख़्म ख़ाते रहें,
और दुआ दिए ग़ए हम…
इफ़्तिख़ार आरिफ़

10625 
क़ाश मैं ऐसी शायरी लिख़ूँ,
तेरी याँदमें,
तेरे दिये ज़ख़्म दिख़ाई दे,
मेरी हर अल्फ़ाज़में  !!!

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