ज़ख़्म-ए-दिल बोले,
मिरे दिलक़े नमक़-ख़्वारोंसे…
लो भला क़ुछ तो मोहब्बतक़ा,
मज़ा याद रहें……
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
10527
खंज़र तो यूँ ही बदनाम हैं साहब…
असली ज़ख़्म तो,
ये क़म्बख़्त लफ़्ज़ क़र ज़ाते हैं।
10528
ज़ख़्म भरने लग़े हैं,
पिछली मुलाक़ातोंक़े…
फ़िर मुलाक़ातक़े,
आसार नज़र आते हैं ll
ज़ुबैर अली ताबिश
ज़ख़्म भरने लग़े हैं,
पिछली मुलाक़ातोंक़े…
फ़िर मुलाक़ातक़े,
आसार नज़र आते हैं ll
ज़ुबैर अली ताबिश
10529
ज़ख़्मोंक़ो मुस्क़ुराहटक़े,
क़म्बलसे ढक़क़र,
दौड़ तो नहीं पाता पर…
आग़े बढ़ता हूँ सरक़ क़र।
10530
ये ज़ख़्म ग़ुलज़ार बन ग़ए हैं,
ये आह-ए-सोज़ाँ घटा बनी हैं…ll
अहमद फ़राज़
ये ज़ख़्म ग़ुलज़ार बन ग़ए हैं,
ये आह-ए-सोज़ाँ घटा बनी हैं…ll
अहमद फ़राज़
No comments:
Post a Comment