21 March 2026

10586 - 10590 बाग़्बान बहार तदबीर वक़्त हक़ीम घाव दवा दर्द फ़ुर्क़त उम्मीद हौसले मरहम ज़ख़्म शायरी


10586
बाग़्बान-ए-चारा-फ़र्मासे,
ये क़हती हैं बहार
ज़ख़्म-ए-ग़ुलक़े वास्ते,
तदबीर-ए-मरहम क़ब तलक़?

                                              अल्लामा इक़बाल

10587
वक़्तक़े पास,
हर घावक़ी दवा हैं,
सच! वक़्तसे बड़ा,
क़ोई हक़ीम नहीं हैं।

10588
क़हते हैं अहल-ए-ज़हाँ,
दर्द-ए-अज़ल हैं ला-दवा
ज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त,
वक़्तक़े मरहमसे पाता हैं शिफ़ा !

                                               अल्लामा इक़बाल

10589
ख़ुशियाँ क़म हैं, ग़म क़म नहीं,
दवाएँ क़म हैं, ज़ख़्म क़म नहीं।

10590
तुम हमारे हौसलेक़ी,
आख़िरी उम्मीद हो
तुम हमारे ज़ख़्मपर,
मरहम लग़ायाँ मत क़रो……!

                                        अबरार अहमद क़ाशिफ़

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